Sunday, December 26, 2010

सहजीवन या स्वच्छंदता का संसार

एक जबर्दस्त मूक क्रांति भारतीय परिवार के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और मजेदार बात यह है कि इस दस्तक की थप-थप को भारतीय चेतना अपने अंदर जगह दे रही है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया में सबसे मजबूत पारिवारिक जीवन का दंभ भरने वाला भारतीय समाज आज लिव-इन-रिलेशनशिप की खुलेआम बात करने में तनिक भी संकोच नहीं कर रहा है, लेकिन यह एक संतोष की भी बात है। संतोष इस बात का है कि अब वह अपनी हजारों साल की परंपरा की आड़ लेकर छोटी-छोटी बातों पर पत्थर से घायल नाग की तरह फंुफकारने से परहेज करने लगा है। यानी कि उसकी पाचन शक्ति बढ़ी है। भारतीयों में बढ़ती इस चेतना को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहिए। साल भर से कुछ अधिक ही हो गया, जब भारतीय समाज में लिव-इन-रिलेशन यानी सहजीवन को एक वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश विद्यायिका के द्वारा की जाने लगी है। इस बीच न्यायपालिका को भी विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए अथवा निर्णय सुनाते हुए सहजीवन की व्याख्याएं करनी पड़ी हैं। निश्चित रूप से इस एक साल में धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष संबंध के इस नए रूप ने बाना धारण करना शुरू कर दिया है, लेकिन यहां जो मेरी चिंता है जिसे आप एक गंभीर चिंता कह सकते हैं कि यह बाना धीरे-धीरे अपने उसी पुराने स्वरूप की झलक पेश करता नजर आ रहा है जिसे हम अब तक वैवाहिक जीवन या दांपत्य जीवन कहते आए हैं। हमें आज लिव-इन-रिलेशनशिप को इसी रूप में समझना भी चाहिए। इस वर्ष अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में हमारी सुप्रीम कोर्ट ने डी. वेलुसामी की याचिका पर अपना निर्णय देते हुए कहा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही महिला उस समय तक गुजारा-भत्ते की हकदार नहीं है जब तक कि वह कुछ मानदंडों को पूरा नहीं करती। इनमें से एक है संबंधित युगल द्वारा समाज के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह पेश करना। निश्चित रूप से न्यायिक निर्णयों को देते समय तथ्यों एवं नियमों के सीमित विकल्प होते हैं और उन्हीं के आधार पर न्यायाधीशों को फैसले देने होते हैं। मेरा उद्देश्य यहां न्यायालयों के निर्णय की समीक्षा करना कतई नहीं है। मैं तो इस निर्णय में निहित उन परिणामों की ओर संकेत करने की कोशिश कर रहा हूं जो सहजीवन के मूल दर्शन को ही निरस्त कर देते हैं। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा सहजीवन के दर्शनशास्त्र पर भी थोड़ा विचार करना चाहिए। इस रूप में आज हमें यह भी सोचना है कि आखिर भारत जैसे परंपरागत समाज को सहजीवन की जरूरत ही क्यों पड़ रही है? हमारे परिवार की यात्रा बड़े कुटुंब से संयुक्त परिवार, संयुक्त परिवार से पति-पत्नी और इनके बच्चों का परिवार, फिर केवल पति-पत्नी का परिवार और अब पति-पत्नी की जगह स्त्री-पुरुष का परिवार की यात्रा तक आ पहुंची है। मुझे लगता है कि इस लंबी एवं परिवर्तनशील यात्रा के केंद्र में जो सबसे प्रभावशाली तत्व काम कर रहा था, वह था स्वतंत्रता की चाहत। पारिवारिक स्तर पर हमेशा इसके सदस्य अपनी सांस और अपनी आवाज़ के लिए छटपटाते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह छटपटाहट केवल महिलाओं में ही थी, बल्कि पुरुषों में भी थी। बाहरी परिस्थितियों के दबाव और दायित्वों ने इस आंतरिक विस्फोट को थामे रखा था। इस तरह की खदबदाहट की आवाज हमें पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में लिखी गई कहानियों में सुनाई पड़ जाती है। यह बात हमारी आंखें खोलने वाली है कि प्रेमचंद्र ने अपनी कहानी मिस पद्मा के स्त्री-पुरुष को लिव-इन-रिलेशनशिपमें रहते हुए दिखाया है। हां, यह जरूर है कि यह संबंध असफल रहा था। किंतु उन्होंने ही अपने महाकाव्यात्मक उपन्यास गोदान में मालती और प्रोफेसर मेहता को सहजीवन का सफल जीवन जीते हुए प्रस्तुत किया। यहां तक कि जब प्रोफेसर मेहता मालती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हैं तो मालती यह कहते हुए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है कि नहीं मेहता, मैं महीनों से इस प्रश्न पर विचार कर रही हूं और अंत में मैंने तय किया है कि मित्र बनकर रहना स्त्री-पुरुष बनकर रहने से कहीं अधिक सुखकर है। क्या आज का लिव-इन-रिलेशनशिप इसी सुख की तलाश में स्थापित किया जाने वाला संबंध नहीं है? लगभग इसी समय सन 1934 में अज्ञेय जी की एक कहानी आई थी, रोज। यह निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की एक औसत औरत के जीवन का एक नीरस एवं अभिशप्त यथार्थ है। इसमें पति और पत्नी दोनों बेहद ऊबे हुए, थके-थके, खीझे और यंत्रवत से हैं। सवाल यहां यह है कि क्या जीवन की इस यात्रा को रामनाम सत्य हैं के पैटर्न पर यूं ही चलते रहने दिया जाए या कि इस मर्ज का कुछ इलाज ढूंढ़ा जाए। सहजीवन इसी तरह के इलाज की दिशा में उठाया गया एक कदम है। यह मूलत: भारतीय दांपत्य जीवन की (पारिवारिक जीवन की नहीं) एक बाइपास सर्जरी है, क्योंकि पुरानी परंपरा की नसों में ऑक्सीजन और रक्त का प्रवाह रुक गया है। यह सहजीवन इस बात की खुलेआम घोषणा है कि हमें अपनी-अपनी आजादियां चाहिए। यहां हमें यानी कि दोनों को, पत्नी को और पति को भी। भारतीय दांपत्य जीवन की शुरुआत ही होती है दोनों के द्वारा अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं का समर्पण करने से और कुछ ही समय के बाद ये दोनों एक-दूसरे की स्वतंत्रताओं के अपहरणकर्ता बनने लगते हैं। मजेदार बात यहां यह है कि दोनों एक-दूसरे के अधिकारों के अपहरणकर्ता होने के बावजूद यह कभी समझ ही नहीं पाते कि वे ऐसा कर रहे है। उन्हें यही लगता रहता हैं कि सामने वाला ऐसा कर रहा है और जिंदगी हमेशा के लिए घुटते रहने के लिए मजबूर हो जाती है। इस घुटन की एक प्रतिक्रिया जहां भारत में लगातार बढ़ रही तलाक की दरों में दिखाई दे रही हैं, जो अब वह सहजीवन तक आ पहुंची है। परंतु इन सारी स्थितियों की भयानक बिडंबना यह भी है कि सहजीवन में रहने वाली महिला गुजारा भत्ता की मांग भी कर रही है। यदि एक महिला ऐसा करती हैं तो ऐसा करके क्या वह अपनी उस स्वतंत्रता के झोंके को बनाए रख सकेगी जो लिव-इन-रिलेशनशिप का आक्सीजन है। दूसरे यदि गुजारा भत्ता ही चाहिए तो फिर विधिवत तरीके से शादी कर लेने से ही परहेज क्यों है? मुझे नहीं लगता कि आर्थिक रूप से परावलंबी स्त्री या पुरुष कभी भी अपनी स्वतंत्रता को बनाए रख सकता है। इसलिए कम से कम फिलहाल तो सहजीवन को ऐसे आर्थिक परावलंबियों के लिए निषिद्ध ही घोषित कर दिया जाना चाहिए। इस बारे में हमारे कानून का भी कहना यही है कि गुजारा-भत्ता तभी मिलेगा जब दोनों समाज के सामने स्वयं को पति-पत्नी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हों। अब समझ में नहीं आ रहा है कि यह प्रस्तुति कैसे जाए? मांग में सिंदूर भरकर, गले में मंगलसूत्र लटकाकर, पैर की उंगली में बिछिया फंसाकर, गोद में बच्चा लेकर अथवा प्रशासन के द्वारा इस आशय का सर्टिफिकेट लेकर। इससे भी बड़ी और सौ बातों की एक बात यह कि यदि पति-पत्नी के रूप में ही पेश होना है तो फिर पति-पत्नी बनकर ही क्यों न किया जाए। सात फेरे ले लेने या कोर्ट में जाकर दस्तखत कर देने से ही भला परहेज क्यों? क्या अब यह नहीं लग रहा कि इतने थोड़े समय में ही ही लिव-इन-रिलेशनशिप अपनी उल्टी चाल चलने लगा है। यदि यह सहजीवन दोनों को स्वंतत्रता नहीं दे सकता, दोनों को आत्मअभिव्यक्ति का अवसर उपलब्ध नहीं करा सकता तो केवल कह देने भर से यह सहजीवन नहीं बन जाएगा, बल्कि यथार्थ में यह एक तरह का परजीवन ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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