Monday, October 31, 2011

पिछले वर्ष 5,484 बच्चे हुए यौन उत्पीड़न के शिकार


सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में 5,484 बच्चों से यौन र्दुव्‍यवहार और 1,408 अन्य की हत्या होने के मामले सामने आए। बच्चों के खिलाफ हुए अपराध की खराब तस्वीर पेश करते राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10,670 बच्चों का या तो अपहरण कर लिया गया या फिर उन्हें बंधक बना लिया गया। उत्तर प्रदेश में 315 बच्चों की हत्या कर दी गई, जबकि मध्य प्रदेश में 1,182 बच्चों के साथ यौन र्दुव्‍यवहार हुआ। अपराध की इन दोनों ही श्रेणियों में इन दो राज्यों में सर्वाधिक मामले सामने आए। आंकड़ों के अनुसार, बच्चों की हत्या के महाराष्ट्र में 211, बिहार में 200 और मध्य प्रदेश में 124 मामले सामने आए। पिछले वर्ष महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में बच्चों से यौन उत्पीड़न के क्र मश: 747, 451 और 446 मामले सामने आए। इसी तरह छत्तीसगढ़ और राजस्थान में क्र मश: 382 और 369 मामले देखे गए। दिल्ली में वर्ष 2010 में 29 बच्चों की हत्या हुई और 304 अन्य का बलात्कार हुआ। बच्चों के अपहरण के सबसे ज्यादा 2,982 मामले दिल्ली में हुए। इस तरह की बिहार में 1,359, उत्तर प्रदेश में 1,225, महाराष्ट्र में 749, राजस्थान में 706, आंध्र प्रदेश में 581 और गुजरात में 565 घटनाएं हुईं। हिंसक अपराधों में अव्वल रहे यूपी और बिहार : राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में हिंसक अपराधों में हुई मौत में उत्तर प्रदेश और बिहार शीर्ष पर रहे। इन दोनों राज्यों में एक साल में कुल 7,800 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल पूरे देश में ऐसे अपराधों में 33,908 लोगों की मौत हुई है। मरने वालों में करीब 50 प्रतिशत (15,787) युवा (18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के) हैं। मरने वाले युवाओं में 4,207 युवतियां थीं। ब्यूरो के अनुसार अगर राज्यों अनुसार देखें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 4,456 लोगों की मौत हुई है। दूसरे स्थान पर बिहार है जहां 3,362 लोग मारे गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र (2,837), आंध्रप्रदेश (2,538) और मध्यप्रदेश (2,441) का स्थान आता है। इस दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ऐसी घटनाओं में 119 महिलाओं समेत 577 लोग मारे गए हैं। ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक, वर्ष 2010 में ऐसी घटनाओं में शून्य से 10 साल की उम्र वर्ग में 343 लड़कियों समेत 727 बच्चों की मौत हुई है।
देश के विभिन्न हिस्सों में 5,484 बच्चों से यौन र्दुव्‍यवहार और 1,408 अन्य की हत्या होने के मामले सामने आए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10,670 बच्चों का या तो अपहरण कर लिया गया या फिर उन्हें बंधक बना लिया गया यूपी में 315 बच्चों की हत्या कर दी गई, जबकि मध्य प्रदेश में 1,182 बच्चों के साथ यौन र्दुव्‍यवहार हुआ महाराष्ट्र, यूपी और आंध्र में बच्चों से यौन उत्पीड़न के क्र मश: 747, 451 और 446 मामले सामने आए बच्चों के अपहरण के सबसे ज्यादा 2,982 मामले दिल्ली में हुए

Friday, October 14, 2011

असहाय वृद्ध किसकी जिम्मेदारी!

इस साल एक अक्टूबर को वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर अखबारों में वृद्धजनों की समस्याओं पर ढेर सारी सामग्री प्रकाशित हुई। वृद्धजन आज कितने असहाय और असुरक्षित हो चले हैं, इसका अलग-अलग कोणों से विवरण था। कही संयुक्त परिवारों का टूटना कारण था तो कहीं बच्चों के संकीर्ण, स्वार्थी हो जाने को कारण बताया गया। इसमें दो राय नहीं कि हमारे समाज में भी बड़ी संख्या में वृद्ध और अशक्त लोग उपेक्षित और बेसहारा हैं। कहीं बच्चे साथ नहीं दते हैं तो कहीं अकेले पाकर घरेलू नौकरों द्वारा मार दिए जाते हैं। लेकिन पूरी समस्या का विश्लेषण यदि नैतिकता तथा भावनात्मक आधार पर किया जाए तो समाधान के रूप में सिर्फ नसीहतें ही सामने आती हैं। जीवन का आखिरी पड़ाव सम्मानजनक और सुरक्षित बीते, इसके लिए अनेक स्तर पर विचार की जरूरत है। हर व्यक्ति इस पड़ाव में प्रवेश करने से पहले यथासंभव अपनी तैयारी और योजनाएं बनाकर रखे। दूसरे यह भी आम स्वीकृत धारणा है कि बच्चों को माता-पिता और वृद्धजनों की जिम्मेदारी वहन करनी चाहिए। याद रहे कि इस सिलसिले में एक विधेयक भी देश की संसद द्वारा पारित किया गया है जिसके अन्तर्गत माता-पिता या आश्रित वृद्धों को कोई व्यक्ति त्यागने के इरादे से कहीं छोड़ देता है तो उसे तीन महीने की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माना दोनों दंड दिये जा सकते हैं। इस माता-पिता बुजुर्ग अभिभावक देखरेख एवं कल्याण विधेयक 2007’ मे भारतीय समाज ओैर पारंपारिक मूल्यों के तहत बुजुगरें की देखभाल पर जोर दिया गया है। बिल पारित करते वक्त कहा गया था कि संयुक्त परिवार व्यवस्था टूटने से बड़े पैमाने पर उनके परिवार के लोग ध्यान नही दे रहे हैं जिसके कारण बहुत से वृद्ध खासकर विधवाएं भावनात्मक उपेक्षा तथा विपन्न जीवन जीने को मजबूर हैं। ध्यान रहे कि बच्चों द्वारा उठायी जाने वाली जिम्मेदारियों के मामले में हमारा समाज लड़के और लड़की के रूप भेदभावपूर्ण ढंग से सोचता है। अमूमन माना जाता है कि माता-पिता की देखभाल लड़के की जिम्मेदारी है। हाल में दिल्ली के पीतमपुरा के 76 वर्षीय किरन नांगरे का मामला सामने आया। किरन की बेटी मधु पाल ने लन्दन से दिल्ली पुलिस के सीनियर सिटिजन सेल में ऑनलाइन शिकायत की कि उसकी भाभी पूनम अपनी सास यानी उसकी मां की ठीक से देखभाल नहीं करती है। यह ठीक है कि बहू को अपनी सास की देखभाल करनी चाहिए, लेकिन क्या उससे अधिक जवाबदेही बेटी मधु की नहीं बनती? सजा की जहां तक बात है तो वह मधु पाल को भी मिलनी चाहिए। हालांकि यह भी सच है कि माता-पिता की सम्पत्ति पर बेटे-बहू का ही कब्जा रहता है और निर्णय भी माता-पिता को करना होता है कि वे अपनी संतानों के बीच सम्पत्ति का बंटवारा किस तरह करेंगे। कुछ महीने पहले बुजुगरें के लिए काम करनेवाली संस्था हेल्प एज इंडिया ने कुछ महानगरों में वृद्धों की स्थिति पर सव्रेक्षण कराया था। पाया गया कि देश में औसतन 72 फीसद माता-पिता अपने बेटों के साथ रहते हैं। मुम्बई में 86 फीसद वृद्ध अपने बेटे के साथ रहते हैं। सिर्फ चेन्नई एकमात्र ऐसा शहर है जहां 22 फीसद वृद्ध अपनी बेटी के साथ रहते हैं। सवाल है कि क्या बेटियों के लिए यह मुद्दा विचारणीय नहीं होना चाहिए कि उनके अपने घर में माताप्िाता के लिए भी स्थान होगा या नहीं? या कि वे सिर्फ भावनात्मक सहयोग ही करेंगी? तीसरा और सबसे बड़ा मुद्दा सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का है जो जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकार की है। प्रशासन को बाध्य किया जाना चाहिए कि जिला या ब्लॉक स्तर पर इसकी सख्त निगरानी हो कि वृद्ध किसी मुसीबत में तो नही हैं। हेल्पएज इंडिया के सव्रेक्षण में यह बात सामने आयी थी कि 98 फीसद वृद्ध प्रताड़नाओं के बावजूद अपनी सन्तानों के खिलाफ शिकायत नहीं करते हैं। लेकिन मामला जटिल है। उसे सिर्फ परिवार या बच्चों के मत्थे मढ़कर सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अशक्त लोगों के जरूरी खच्रे की जिम्मेदारी उठाये? संविधान के अनुच्छेद 41 में भी वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता दिए जाने की बात है। लेकिन वह नीतिनिर्देशक तत्व के अन्तर्गत है। इसे प्रभावी बनाते हुए सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी हो। संविधान की धारा 21 हर नागरिक को सम्मानजन जीवन जीने का अधिकार देती है। वह सम्मान कैसे प्राप्त होगा, यह मूल मुद्दा है। क्या यह सिर्फ परिवार के अन्दर की व्यवस्था से ठीक होगा या इसका राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए? पश्चिम के अनेक घोर पूंजीवादी देशों में भी व्यवस्था है कि कोई असहाय रूप में धूल-धूप- भूख से प्राण न त्यागे। हालांकि उन्हें भी (और हमें भी) घर के अन्दर के गैर-बराबरीपूर्ण रिश्ते समाप्त करने तथा सदस्यों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। बहरहाल, यह सदिच्छा मूल्यों में कैसे समाहित हो इसके लिए प्रयास होना चाहिए। लेकिन नागरिक अधिकारों की गारंटी तो राज्य को ही सुनिश्चित करनी होगी।

Monday, October 3, 2011

बच्चों के जीवन पर संकट



किसी भी सभ्य समाज और राष्ट्र के लिए बच्चे थाती होते हैं। इनकी अनदेखी कर समाज व राष्ट्र को समृद्ध और ताकतवर नहीं बनाया जा सकता। लेकिन सच तो यह है कि देश के इन भावी कर्णधारों का जीवन संकट में फंसता जा रहा है। समाज व सरकार की अतिसक्रियता के बाद भी बच्चों पर होने वाली ज्यादतियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। वैसे तो संविधान के अनुच्छेद 23 24 में मानव तस्करी व बलात् श्रम के अलावा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने या अन्य जोखिम भरे काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाया गया हैं। लेकिन तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी बच्चों की तस्करी के साथ- साथ उनसे बेगार लेने का काम यथावत जारी है। 1976 के बंधुआ मजदूरी उन्मूलन एक्ट के बावजूद भी बच्चे बंधुआ जीवन जीने को अभिशप्त हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास बंधुआ मजदूरी के एक दो नहीं हजारों मामले दर्ज हैं लेकिन गुनाहगारों के खिलाफ सरकार सख्ती नहीं दिखा रही है। पिछले दिनों आयी मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल तकरीबन 40 हजार बच्चों का अपहरण हो जाता है और त्रासदी यह कि इनमें से एक चौथाई बच्चों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिल पाती है। इस अर्थ में देखा जाए तो भारत दुनिया के उन खतरनाक देशों में शुमार हो गया है जहां बच्चों की तस्करी आम बात होती है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में 14 साल के कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिक भारत में मौजूद हैं। इसके अलावा बच्चों के यौन शोषण का मामला भी गहराता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि सरकार इन सामाजिक बुराईयों से अवगत नहीं है लेकिन वह इन दुप्रवृत्तियों पर रोक लगाने में असमर्थ साबित हो रही है। हालांकि पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बाल यौन शोषण पर रोक लगाने से संबंधित एक विधेयक को मंजूरी दी लेकिन समाज की जड़ में पहुंच चुकी बुक्षईयों को खत्म करने के लिए ऐसे विधेयक अभी नाकाफी ही कहे जाएंगे। महज कानूनी दंड के भय से सामाजिक बुराईयों और आपराधिक कृत्यों पर विराम लगना संभव नहीं है, अगर ऐसा होता तो बालश्रम कानून लागू होने के बाद बच्चों पर होने वाले अत्याचारों में कमी देखी जाती। लेकिन स्थिति भिन्न है। सच तो यह है कि कानून का निर्माण तो हो रहा है लेकिन उसका पालन नहीं। दूरदृष्टि रखने वाले समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों के जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए समुचित वातावरण का निर्माण करे। लेकिन आजादी के छह दशक गुजर जाने के बाद भी देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कोई कारगर नीति अभी तक अमल में नहीं लायी जा सकी है। विकास के पथ पर अग्रसर बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर मान्यता मिलने के बाद भी बच्चों की मौत के मामले में हम वि में शीर्ष पर खड़े हैं। हर साल देश में पांच साल से कम उम्र के 20 लाख बच्चों की असामयिक मौत हो जाती है। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों के 90 फीसद मामले निमोनिया और डायरिया जैसी आसान रोकथाम वाली बीमारियों से जुड़े होते हैं। इस संस्था ने यह भी कहा है कि भारत में दुनिया के कुपोषित बच्चों की एक तिहाई संख्या बसती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट पर यकीन करें तो दुनिया भर में तकरीबन 15 करोड़ से अधिक बच्चे खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे हैं और इनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की ही है। इन बच्चों में लड़कियों की स्थिति तो और भी भयावह और तकलीफदेह है। यूनिसेफ के ताजा अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब 10 करोड़ लड़कियां विभिन्न खतरनाक उद्योग धंधों में काम कर रहीं हैं। इनमें से कई ऐसी हैं जिनका इस्तेमाल वेश्यावृत्ति, अश्लील फिल्मों के निर्माण और सैन्य हमलों के लिए किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत की राजधानी दिल्ली में ही करीब पांच लाख बच्चे भिखारी, घरेलू नौकर और अनियमित श्रमिक के रूप में जीवन यापन कर रहे हैं। दिल्ली जैसे शहर में भिखारियों की संख्या एक लाख से अधिक है और जिनमें एक चौथाई तादात बच्चों की ही है। जब देश की राजधानी दिल्ली में कानूनी व्यवस्था अपना असर नहीं दिखा पा रही है तो दूरदराज क्षेत्रों में बच्चों के साथ क्या गुजरती होगी इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। अब तो गलत कायरे को अंजाम दिलाने के लिए बच्चे साफ्ट टारगेट बनते जा रहे हैं। हथियारों की तस्करी से लेकर मादक पदाथरे की सप्लाई तक में बच्चों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इससे बच्चों में नशीले पदाथरे के सेवन की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। सिर्फ यह कहना कि बालश्रम के लिए गरीबी, भूख और बदहाली ही जिम्मेदार है, उचित नहीं होगा। यह एक कारण हो सकता है। इसके अलावा समाज में जागरुकता की कमी, सामाजिक उत्तरदायित्व से मुंह चुराने की प्रवृत्ति और अपराधियों का दंड से बच निकलना भी अन्य प्रमुख कारण हैं। दुख की बात यह है कि समाज के जिम्मेदार कहे जाने वाले लोगों द्वारा बालश्रम, बच्चों की तस्करी, उनके यौन शोषण जैसी तमाम सामाजिक बुराईयों को लेकर गंभीर चिंता तो जताई जाती रही है लेकिन जमीनी तौर पर उनके संरक्षण के लिए कोई पुख्ता कार्य नहीं किया जा रहा है। अब तो गंभीर गोष्ठियां और सेमिनार भी शोशेबाजी लगने लगे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं बालश्रम, यौन शोषण और बच्चों की तस्करी के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई से लेकर सकारात्मक आंदोलन चलाए। अन्यथा कल के भारत की तस्वीर और धुंधली ही होगी।