Tuesday, December 28, 2010

सवाल है इस सोच का

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है कि वहां दो तरह की नागरिकता तय की जाए, वह भी कपड़ों के आधार पर। जाति, संप्रदाय, क्षेत्र या भाषा के आधार पर ऐसा भेदभाव अपने क्षुद्र स्वार्थ साधने के लिए अभी तक कुछ राजनेता जरूर करते रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत में नौकरशाही ने घोषित तौर पर ऐसा कभी नहीं किया। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता से पहले उसकी प्रकृति ऐसी ही रही है और उस पर बार-बार यह आरोप चस्पा किया जाता रहा है कि उसकी प्रेरणा का स्रोत ब्रिटिश अफसरशाही ही है। इसके बावजूद भारत की नौकरशाही ने कभी ऐसा कुछ किया हो, इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता है। नागरिकता के वर्गीकरण का यह काम पंजाब के जालंधर शहर में यूनियन बैंक के अधिकारियों ने किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूरों के लिए रुपये जमा कराने और भुगतान के लिए एक दिन नियत कर दिया है। इसके अलावा किसी और दिन वे बैंक से व्यवहार नहीं कर सकते और इसके पीछे तर्क यह है कि श्रमिकों की लंबी लाइन लगने से दूसरे लोगों को असुविधा होती है। हालांकि इस संबंध में कारण के रूप में सबसे पहले जो बात सामने आई, वह यह थी कि मजदूर गंदे कपड़े पहनकर आते हैं और इससे दूसरे ग्राहकों को परेशानी होती है। इनमें से किसी भी कारण के आधार पर भेदभाव करना, क्या सही ठहराया जा सकता है? यह उस पंजाब में हो रहा है, जहां आम जनता उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों का खुले दिल से स्वागत करती है। हालांकि जागरण द्वारा इस संबंध में समाचार प्रकाशित करने और इसकी चौतरफा निंदा होने के बाद बैंक प्रबंधन ने श्रमिकों को असुविधा के लिए खेद जताया है और सबके लिए समान सुविधाएं बहाल करने की बात की है, लेकिन सवाल यह है कि यह स्थिति आई ही क्यों? ऐसा उस स्थिति में होता रहा है, जबकि राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक का स्पष्ट निर्देश है कि गरीब लोगों को भी बैंकों से जोड़ा जाए। सवाल यह है कि क्या ऐसा व्यवहार गरीबों को बैंकों से जुड़ने देगा? पंजाब में चारों तरफ बैंक के इस व्यवहार की निंदा हो रही है। राज्यसभा सदस्य अविनाश राय खन्ना ने तो इस मामले को संसद में उठाने तक की बात कही है। पंजाब के श्रम और चिकित्सा शिक्षा व अनुसंधान मंत्री तीक्ष्ण सूद ने भी इस पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे बड़ा सामाजिक मसला बताया है और कहा है कि ऐसा भेदभाव सरासर गलत है। युवा अकाली दल के संरक्षक और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा है कि देश की सबसे बड़ी खूबसूरती इसके लोकतंत्र में है, जिसमें गरीब-अमीर सबके लिए समान अधिकार हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र और बलिया के सांसद नीरज शेखर तथा पश्चिमी दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र ने भी इस बैंक की ऐसी नीतियों को मानवता विरोधी बताया है। पंजाब के तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठन बैंक के ऐसे आदेशों के खिलाफ मुखर हो उठे हैं। उनका यह रोष कोई गैर वाजिब नहीं है। भारत का संविधान स्वीकार किए जाने के बाद से यह बात हजार बार कही जा चुकी है कि भारतीय संविधान ऐसे किसी आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है। इसके बावजूद कभी कहीं जाति-धर्म या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव की बात उठ जाती है, तो कभी राज्य या भाषा के नाम पर। अब तक ऐसा काम आम तौर पर राजनेताओं के वेश में क्षुद्र स्वार्थी तत्व करते रहे हैं। पूरा देश जानता है कि खुद को राजनेताओं कहने वाले ऐसे तत्वों की कोशिश हमेशा इन बातों में फंसाकर जनता को बरगलाने की होती है। वे घृणा के बीज बोकर वोटों की फसल काटने की कोशिश करते हैं। ऐसी स्थिति में मुख्य धारा के सभी राजनीतिक संगठन और बड़े राजनेता उनकी निंदा ही करते हैं। जनता भी ऐसे राजनेताओं की हकीकत जानती है और इसीलिए वह इनके बहकावे में नहीं आती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि क्षुद्र स्वार्थो के लिए घृणा फैलाकर राजनीतिक खेल खेलना कतई सही नहीं है। इस हिसाब से देखा जाए तो बैंक का यह कृत्य उनसे भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इससे यह साफ जाहिर होता है कि उनके मन में गरीब तबके के लोगों के प्रति कैसी घृणा भरी हुई है। ध्यान रहे, यूनियन बैंक का उद्घाटन वर्ष 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था, जो भेदभाव के धुर विरोधी थे। क्या यह संविधान की मूल भावना का अपमान नहीं है? भारतीय संविधान देश के नागरिकों के बीच किसी प्रकार के भेदभाव को अपराध मानता है और यहां संविधान ही संप्रभु है। इस तरह देखें तो सही मायने में यह देश की संप्रभुता का अपमान है। रुपये जमा न कराना भी क्या राष्ट्रीय मुद्रा का अपमान नहीं है? आखिर इससे क्या जाहिर होता है? यही न कि अपने राष्ट्र, संविधान और मुद्रा के प्रति हमारी अफसरशाही के मन में कोई सम्मान नहीं है? वह भी ऐसे समय में, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास के लिए पूरे विश्व के एक होने की बात चल रही हो। देशों के बजाय अंतरराष्ट्रीय संघों की मुद्राएं चलाई जा रही हों। यूरोप में तो यूरो चल ही रहा है, दक्षिण एशिया के लिए भी एक साझी मुद्रा की बात चल रही है। तब पिछड़ेपन की इस मानसिकता की वजह क्या है? आजादी के 60 वर्ष बाद तक ऐसी स्थिति बनी क्यों हुई है? इससे जाहिर होता है कि न केवल हमारी अफसरशाही, पूरी व्यवस्था ही अभी तक आभिजात्य मानसिकता से बाहर नहीं निकल सकी है। खासकर अफसरशाही ब्रिटिश दौर के हैंगओवर से उबर नहीं सकी है। हमारे ब्यूरोक्रेट आज भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वे जनता पर शासन के लिए नहीं, उसकी सेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं। चुनाव के बाद अधिकतर राजनेता भी इसी मूड में आ जाते हैं। असंतुलित विकास भी इसका ही नतीजा है। सच तो यह है कि आजादी के 60 साल बाद तक हमारे देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसी समस्याएं समाधान की स्थिति से बहुत दूर दिखाई देती हैं। न तो नौकरशाही ने इस पर कभी ईमानदारी से सोचने की जहमत उठाई और न राजनेताओं ने ही। आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो अहम पदों पर बैठे लोग अपनी संपत्ति की घोषणा करने से ही डर रहे हैं और दूसरी ओर आम जनता दिन-प्रतिदिन लगातार गरीब होती जा रही है? इस सभी मसलों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है। देश और जनता की दुर्दशा की एक बड़ी वजह अफसरशाही की यह सोच भी है। जो लोग मैले-कुचैले कपड़ों में आई जनता को देखना तक बर्दाश्त नहीं कर सकते, वे उससे बातें कैसे करते होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ग्रामीण विकास की अधिकतर योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बैंक अफसरों को ऐसी ही गरीब जनता से मिलना होता है। सोचा जा सकता है कि ऐसे बैंक अधिकारी ग्रामीण योजनाओं का क्रियान्वयन कितनी ईमानदारी से करते होंगे। क्या सरकार इस सोच का कोई इलाज करेगी? (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

Monday, December 27, 2010

अपने ही बदलाव से डरता समाज

बिंदासशब्द की हकीकत सामाजिक मूल्यों से आकर जब टकराती है, तब हम गहरे आहत होते हैं। क्षणभर में हमारी नैतिकता, हमारी संस्कृति खतरे में पड़ जाती है। गाहे-बगाहे खुद को बेहद खुला समाज कहने वाले हम किस पल हिंसक हो जाते हैं, हमें पता ही नहीं चल पता। फिर यही बिंदास शब्द हमें मुंह चिढ़ाता हुआ-सा जान पड़ता है। बेशक हम आज 21वीं सदी में हैं। सदियों के बदलाव के हिसाब से हममें व हमारे समाज में परिवर्तन भी काफी आये हैं। काफी कु छ परिवर्तन नयी-नयी तकनीकों पर निर्भर रहने लगा है। सामाजिक बदलाव का असर यह हुआ है कि कु नबों में रहने की परम्परा खत्म हो चुकी है। एकल परिवार की धारणा हमारे इर्द-गिर्द बहुत तेजी से विकसित होती जा रही है। बर्दाश्त करने का जज्बा हमारे भीतर से जाता रहा है। दबंगई पर हम यकीन करने लगे हैं। लेकिन बावजूद इन सब धारणाओं-अवधारणाओं के हमारे समाज का ताना-बाना अब भी उतना नहीं बदल सका है, जितना कि बदलने का हम अक्सर दिखावाकरते रहते हैं। यह दिखावा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हम भी पश्चिमी समाजों की तरह खुद को, खुले रूप से, बदलने की होड़ में लगे हैं। दिलचस्प बात है कि यह होड़ सामाजिक सोच के दायरों को कुं ठित स्थापनाओंसे बाहर निकालने से कहीं ज्यादा मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसेतक ही सिमटकर रह गयी है। जब हम पश्चिमी समाजों के साथ खुद को बदलने की होड़ कर रहे होते हैं, तब यह भूल जाते हैं कि उनका समाज हमारे समाज से हर मामले में काफी जुदा है। वे बेहद स्वतंत्र है, बेहद जवान है, बेहद उन्मुक्त हैं। वहां के समाज पर लड़कियों के तन पर कपड़े होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, परंतु हमारे यहां बहुत पड़ता है। वहां राह चलती लड़कियों पर न सीटियां बजायी जाती हैं, न फब्तियां कसी जाती हैं, परंतु हमारे यहां यह सब होता है। वे सोच के खुलेपन को स्वीकार करने में हमसे कहीं ज्यादा आगे रहते हैं। मगर हमारे यहां सोच के दायरे अभी भी सीमित हैं। असल में हम जिस बदलाव की बात करते हैं, वे उधारऔर जुगाड़का बदलाव है। चंद विकसित परिवारों और शहरों के रहन-सहन को देखकर ही हम यह स्वीकार कर बैठे हैं कि हमारा समाज पूरी तरह से बदल चुका है। अब हम विकसित हैं लेकिन ऐसा है नहीं। अगर वाकई ऐसा होता, तो इस वक्त हम बिग बॉस और राखी का इंसाफ के बिंदासपन पर उंगलियां न उठा रहे होते! नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की दुहाई दे-देकर लम्बी-चौड़ी बहसें न कर रह होते। घर- परिवार के बच्चों के बिगड़ने का खतरा हमें नहीं सता रहा होता। न ही इन प्रोग्रामों पर समय का पहराबैठा रहे होते। यह मानकर चलें कि हम बेहद संवेदनशील समाज
हैं। समाज की संवेदनशीलता से अलहदा अगर हमारे समाने कु छ भी बिंदास आता है, तो हम पलभर में बिफर उठते हैं। कैसी विडम्बना है कि हमारी सामाजिक संवेदनाएं कभीवाटरतो कभी फायरफिल्म के प्रदर्शन मात्र से ही आहत हो जाती हैं। भीतर का सच जब निकलकर बाहर आ खड़ा होता है, तब हमारा विवेक, हमारा कथित खुलापन पलभर में ध्वस्त हो जाता है। उस वक्त हमारी मनोवैज्ञानिक स्थिति यह रहती है कि हम अपनी आंखों पर तो उस दृश्य को न देखने का पहरा लगा देते हैं, परंतु हमारा मन उस दबी-ढकी चीज का सच जानने का ही प्रयास करता रहता है। लेकिन हम इस सच को सामने लाने से कतराते हैं, सिर्फ इस वजह से कि लोग क्या कहेंगे? समाज क्या सोचेगा? दरअसल, इसी अविकसित सोचके फोबिये ने ही हमारा और हमारे समाज का बेड़ा गर्क किया हुआ है। जिन बातों को हम दिन-रात अपने साथ, अपने आसपास, अपने परिवार के मध्य जीते हैं, जब वही सब परदे पर जीवंत होता है, तब हम उसे देखकर बौखला-से जाते हैं। मुंह से निकल ही जाता है कि हाय! देखो परदे पर यह सब क्या चल रहा है? उस वक्त हम खुद को कोई दोष नहीं देते, दोष देते हैं केवल परदे के पात्रों को। उस समय परदे के ये पात्र हमें हमारा ही आईना दिखा रहे होते हैं कि हम और हमारी बातें हकीकत में क्या हैं? साथ ही, यह न भूलें कि परदे के ये पात्र हमारे ही बीच के सदस्य होते हैं। उन्होंने यह सब हम से ही सीखा व जाना है। फिर बताएं दोषी वे हुए याकि हम? कहते हैं कि सच कड़ुवा होता है। आज हमारी स्थिति ठीक उसी कड़ुवे सच की तरह है, जिसे हम गले के नीचे उतार नहीं पा रहे हैं। उस पर अपनी कथित नैतिकताओं, परंपराओं व आदर्शो की चाश्नी का लेपलगाकर मीठा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इस बौराये समय में ये प्रयास व्यर्थ ही हैं। समाज निरंतर उन्मुक्त होता चला जा रहा है। किसी को कु छ भी न समझने का धैर्य समाप्त होता जा रहा है। युवाओं के इरादे अब भगत सिंह की क्रांति को नहीं, सलमान खान की दबंगई को आत्मसात करने को फौरन तैयार रहते हैं। समाज में क्रांति की सम्भावनाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं। यह निरंतर बदलता और बिंदास होता समाज आगे और कौन-कौन से अकूत कारनामों से हमें रू-ब-रू करवाएगा, अभी देखा शेष है। 

Sunday, December 26, 2010

सहजीवन या स्वच्छंदता का संसार

एक जबर्दस्त मूक क्रांति भारतीय परिवार के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और मजेदार बात यह है कि इस दस्तक की थप-थप को भारतीय चेतना अपने अंदर जगह दे रही है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया में सबसे मजबूत पारिवारिक जीवन का दंभ भरने वाला भारतीय समाज आज लिव-इन-रिलेशनशिप की खुलेआम बात करने में तनिक भी संकोच नहीं कर रहा है, लेकिन यह एक संतोष की भी बात है। संतोष इस बात का है कि अब वह अपनी हजारों साल की परंपरा की आड़ लेकर छोटी-छोटी बातों पर पत्थर से घायल नाग की तरह फंुफकारने से परहेज करने लगा है। यानी कि उसकी पाचन शक्ति बढ़ी है। भारतीयों में बढ़ती इस चेतना को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहिए। साल भर से कुछ अधिक ही हो गया, जब भारतीय समाज में लिव-इन-रिलेशन यानी सहजीवन को एक वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश विद्यायिका के द्वारा की जाने लगी है। इस बीच न्यायपालिका को भी विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए अथवा निर्णय सुनाते हुए सहजीवन की व्याख्याएं करनी पड़ी हैं। निश्चित रूप से इस एक साल में धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष संबंध के इस नए रूप ने बाना धारण करना शुरू कर दिया है, लेकिन यहां जो मेरी चिंता है जिसे आप एक गंभीर चिंता कह सकते हैं कि यह बाना धीरे-धीरे अपने उसी पुराने स्वरूप की झलक पेश करता नजर आ रहा है जिसे हम अब तक वैवाहिक जीवन या दांपत्य जीवन कहते आए हैं। हमें आज लिव-इन-रिलेशनशिप को इसी रूप में समझना भी चाहिए। इस वर्ष अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में हमारी सुप्रीम कोर्ट ने डी. वेलुसामी की याचिका पर अपना निर्णय देते हुए कहा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही महिला उस समय तक गुजारा-भत्ते की हकदार नहीं है जब तक कि वह कुछ मानदंडों को पूरा नहीं करती। इनमें से एक है संबंधित युगल द्वारा समाज के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह पेश करना। निश्चित रूप से न्यायिक निर्णयों को देते समय तथ्यों एवं नियमों के सीमित विकल्प होते हैं और उन्हीं के आधार पर न्यायाधीशों को फैसले देने होते हैं। मेरा उद्देश्य यहां न्यायालयों के निर्णय की समीक्षा करना कतई नहीं है। मैं तो इस निर्णय में निहित उन परिणामों की ओर संकेत करने की कोशिश कर रहा हूं जो सहजीवन के मूल दर्शन को ही निरस्त कर देते हैं। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा सहजीवन के दर्शनशास्त्र पर भी थोड़ा विचार करना चाहिए। इस रूप में आज हमें यह भी सोचना है कि आखिर भारत जैसे परंपरागत समाज को सहजीवन की जरूरत ही क्यों पड़ रही है? हमारे परिवार की यात्रा बड़े कुटुंब से संयुक्त परिवार, संयुक्त परिवार से पति-पत्नी और इनके बच्चों का परिवार, फिर केवल पति-पत्नी का परिवार और अब पति-पत्नी की जगह स्त्री-पुरुष का परिवार की यात्रा तक आ पहुंची है। मुझे लगता है कि इस लंबी एवं परिवर्तनशील यात्रा के केंद्र में जो सबसे प्रभावशाली तत्व काम कर रहा था, वह था स्वतंत्रता की चाहत। पारिवारिक स्तर पर हमेशा इसके सदस्य अपनी सांस और अपनी आवाज़ के लिए छटपटाते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह छटपटाहट केवल महिलाओं में ही थी, बल्कि पुरुषों में भी थी। बाहरी परिस्थितियों के दबाव और दायित्वों ने इस आंतरिक विस्फोट को थामे रखा था। इस तरह की खदबदाहट की आवाज हमें पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में लिखी गई कहानियों में सुनाई पड़ जाती है। यह बात हमारी आंखें खोलने वाली है कि प्रेमचंद्र ने अपनी कहानी मिस पद्मा के स्त्री-पुरुष को लिव-इन-रिलेशनशिपमें रहते हुए दिखाया है। हां, यह जरूर है कि यह संबंध असफल रहा था। किंतु उन्होंने ही अपने महाकाव्यात्मक उपन्यास गोदान में मालती और प्रोफेसर मेहता को सहजीवन का सफल जीवन जीते हुए प्रस्तुत किया। यहां तक कि जब प्रोफेसर मेहता मालती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हैं तो मालती यह कहते हुए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है कि नहीं मेहता, मैं महीनों से इस प्रश्न पर विचार कर रही हूं और अंत में मैंने तय किया है कि मित्र बनकर रहना स्त्री-पुरुष बनकर रहने से कहीं अधिक सुखकर है। क्या आज का लिव-इन-रिलेशनशिप इसी सुख की तलाश में स्थापित किया जाने वाला संबंध नहीं है? लगभग इसी समय सन 1934 में अज्ञेय जी की एक कहानी आई थी, रोज। यह निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की एक औसत औरत के जीवन का एक नीरस एवं अभिशप्त यथार्थ है। इसमें पति और पत्नी दोनों बेहद ऊबे हुए, थके-थके, खीझे और यंत्रवत से हैं। सवाल यहां यह है कि क्या जीवन की इस यात्रा को रामनाम सत्य हैं के पैटर्न पर यूं ही चलते रहने दिया जाए या कि इस मर्ज का कुछ इलाज ढूंढ़ा जाए। सहजीवन इसी तरह के इलाज की दिशा में उठाया गया एक कदम है। यह मूलत: भारतीय दांपत्य जीवन की (पारिवारिक जीवन की नहीं) एक बाइपास सर्जरी है, क्योंकि पुरानी परंपरा की नसों में ऑक्सीजन और रक्त का प्रवाह रुक गया है। यह सहजीवन इस बात की खुलेआम घोषणा है कि हमें अपनी-अपनी आजादियां चाहिए। यहां हमें यानी कि दोनों को, पत्नी को और पति को भी। भारतीय दांपत्य जीवन की शुरुआत ही होती है दोनों के द्वारा अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं का समर्पण करने से और कुछ ही समय के बाद ये दोनों एक-दूसरे की स्वतंत्रताओं के अपहरणकर्ता बनने लगते हैं। मजेदार बात यहां यह है कि दोनों एक-दूसरे के अधिकारों के अपहरणकर्ता होने के बावजूद यह कभी समझ ही नहीं पाते कि वे ऐसा कर रहे है। उन्हें यही लगता रहता हैं कि सामने वाला ऐसा कर रहा है और जिंदगी हमेशा के लिए घुटते रहने के लिए मजबूर हो जाती है। इस घुटन की एक प्रतिक्रिया जहां भारत में लगातार बढ़ रही तलाक की दरों में दिखाई दे रही हैं, जो अब वह सहजीवन तक आ पहुंची है। परंतु इन सारी स्थितियों की भयानक बिडंबना यह भी है कि सहजीवन में रहने वाली महिला गुजारा भत्ता की मांग भी कर रही है। यदि एक महिला ऐसा करती हैं तो ऐसा करके क्या वह अपनी उस स्वतंत्रता के झोंके को बनाए रख सकेगी जो लिव-इन-रिलेशनशिप का आक्सीजन है। दूसरे यदि गुजारा भत्ता ही चाहिए तो फिर विधिवत तरीके से शादी कर लेने से ही परहेज क्यों है? मुझे नहीं लगता कि आर्थिक रूप से परावलंबी स्त्री या पुरुष कभी भी अपनी स्वतंत्रता को बनाए रख सकता है। इसलिए कम से कम फिलहाल तो सहजीवन को ऐसे आर्थिक परावलंबियों के लिए निषिद्ध ही घोषित कर दिया जाना चाहिए। इस बारे में हमारे कानून का भी कहना यही है कि गुजारा-भत्ता तभी मिलेगा जब दोनों समाज के सामने स्वयं को पति-पत्नी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हों। अब समझ में नहीं आ रहा है कि यह प्रस्तुति कैसे जाए? मांग में सिंदूर भरकर, गले में मंगलसूत्र लटकाकर, पैर की उंगली में बिछिया फंसाकर, गोद में बच्चा लेकर अथवा प्रशासन के द्वारा इस आशय का सर्टिफिकेट लेकर। इससे भी बड़ी और सौ बातों की एक बात यह कि यदि पति-पत्नी के रूप में ही पेश होना है तो फिर पति-पत्नी बनकर ही क्यों न किया जाए। सात फेरे ले लेने या कोर्ट में जाकर दस्तखत कर देने से ही भला परहेज क्यों? क्या अब यह नहीं लग रहा कि इतने थोड़े समय में ही ही लिव-इन-रिलेशनशिप अपनी उल्टी चाल चलने लगा है। यदि यह सहजीवन दोनों को स्वंतत्रता नहीं दे सकता, दोनों को आत्मअभिव्यक्ति का अवसर उपलब्ध नहीं करा सकता तो केवल कह देने भर से यह सहजीवन नहीं बन जाएगा, बल्कि यथार्थ में यह एक तरह का परजीवन ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)