Saturday, June 30, 2012

कम उम्र में गर्भ से किशोरियों की मौत


किशोरियों का कम उम्र में गर्भधारण करना ही उनकी मौत का सबसे बड़ा कारण है। सेव द चिल्ड्रेन नामक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है। इसमें कहा गया है कि प्रसव के समय संक्रमण या बीमारी हो जाने से हर साल दस लाख किशोरियों की मौत हो जाती है। इस समस्या का सबसे बड़ा कारण गर्भनिरोधकों से अनभिज्ञता बताया गया है। लाइबीरिया मेंएक-तिहाई नवजात शिशुओं की मांओं की उम्र 15 से 19 वर्ष के बीच होती है। संस्था के प्रोजक्ट मैनेजरर जॉर्ज किजाना के अनुसार, कम उम्र में मां बनने से इन लड़कियों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि शारीरिक तौर पर बच्चे को जन्म देने में अक्षम होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में 40 प्रतिशत जन्म गैर-इरादतन होता है। किशोरियों को परिवार नियोजन की सुविधा उपलब्ध ही नहीं हो पाती है। बड़ी आबादी वाले देशों खास तौर पर दक्षिण एशिया में ऐसा देखने को मिलता है। भारत में 15 से 19 वर्ष की 47 प्रतिशत लड़कियां सामान्य वजन से कम हैं। जबकि 56 प्रतिशत लड़कियां रक्त की कमी से पीडि़त हैं। भारत में 2008 में हुए एक सर्वेक्षण में 15 से 24 साल के बीच उम्र के बीच की लड़कियों में आधी से ज्यादा ने कहा कि उन्हें कभी भी यौन शिक्षा नहीं मिली। जहां 30 प्रतिशत ने कंडोम के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई वहीं 77 प्रतिशत ने कहा कि उनसे कभी किसी ने गर्भनिरोधक के बारे में बात नहीं की। भारत में 15 से 19 साल केबीच शादी होने वालों की संख्या 30 प्रतिशत है। इस उम्र में शादी करने वाले लड़कों की संख्या केवल पांच प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के कई कार्यक्रम कभी पैसे की कमी तो कभी धार्मिक कारणों से सफल नहीं हो पाएं हैं।

दहेज उत्पीड़न की बढ़ती समस्या

भारत में दहेज लेने व देने के खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं, फिर भी दहेज की मांग और दहेज हत्याएं नहीं रुक रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि दोषी सलाखों से बच रहे हैं। दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ की मानें तो अधिकतर परिवारों की प्रवृत्ति ही ऐसी है जिसमें वह अपनी बेटियों को जुल्म सहने देते हैं और उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते हैं। इस प्रवृत्ति के चलते दहेज के अदालती मामले कमजोर पड़ जाते हैं और कानून दोषियों को सजा नहीं दे पाता। अदालत के इस नजरिये से शायद ही कोई असहमत होगा। इस संदर्भ में एक उदाहरण काफी उपयोगी है। दिल्ली की रहने वाली सीमा का विवाह फरवरी 2006 में हुआ और शादी बाद से ही न सिर्फ उससे अधिक दहेज की मांग की जाने लगी, बल्कि उस पर अत्याचार भी शुरू कर दिए गए। तंग आकर एक दिन वह अपने मायके लौट आई, लेकिन 16 मई, 2006 को सीमा की मां व उसके भाई उसे जबरन ससुराल छोड़ आए। उसके पति व सास-सुसर से यह कहते हुए कि वह उनकी दहेज की मांगों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन ससुराल में सीमा के लिए कोई जगह नहीं थी। कम दहेज लाने वाली बहू का ससुराल में वैसे भी सम्मान कम होता है। सीमा दोबारा अपने मायके लौट आई, लेकिन उस पर मानसिक दबाव इतना अधिक था कि उसने जून 2006 में आत्महत्या का प्रयास किया। वह बुरी तरह जल चुकी थी जब उसके माता-पिता उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। उसके माता-पिता ने आरोप लगाया कि सीमा ने आत्महत्या इसलिए की, क्योंकि दहेज की मांग को लेकर उसके ससुराल वाले उसे मानसिक व शारीरिक यातनाएं दे रहे थे। पर सवाल है कि सीमा की आत्महत्या के लिए कौन दोषी है? उसके ससुराल वाले जो दहेज के लालच में उसे मानसिक व शारीरिक कष्ट पहंुचा रहे थे या उसके माता-पिता जो यातनाएं भुगत रही अपनी बेटी के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हुए अथवा दोनों ही पक्ष दोषी हैं। वास्तव में इसके लिए हमारा समाज भी दोषी है जो दहेज पर विराम लगाने के लिए सकारात्मक प्रयास नहीं करता। इस मामले में सीमा के पति व सास-ससुर को हत्या के आरोप से मुक्त करते हुए दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने पीडि़त स्कूल टीचर सीमा के माता-पिता को दोषी ठहराया, क्योंकि उन्होंने समय रहते यानी जब सीमा जीवित थी तो दहेज उत्पीड़न का मामला न तो पुलिस में दर्ज कराया और न ही अपने रिश्तेदारों व दोस्तों को इस बारे में कुछ बताया। इस कारण आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे जिससे अदालत को उन्हें मजबूरन बरी करना पड़ा। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि दहेज के मामलों, महिला उत्पीड़न व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान करने के लिए तमाम कानून भले ही बना लिए गए हैं, लेकिन बावजूद इसके जमीनी सच्चाई में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। शायद इसी कारण न्यायाधीश कामिनी लॉ ने कहा कि पीडि़तों व उनके परिवारों को यह समझना आवश्यक है कि जब तक दहेज की मांग व उत्पीड़न को समय रहते रिपोर्ट नहीं किया जाएगा और लड़की के परिवार वाले उसके समर्थन में खड़े नहीं होंगे तब तक अदालतें व अन्य एजेंसियां पीडि़तों के लिए कुछ विशेष नहीं कर पाएंगी। दरअसल इस बात को समझने की आवश्यकता है कि ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट न करने से महत्वपूर्ण साक्ष्य खत्म हो जाते हैं जिस कारण दोषी भी अक्सर बच जाते हैं। न्यायाध्ीश कामिनी लॉ के अनुसार सीमा के मामले में सबूतों का नितांत अभाव था। अगर उत्पीड़न हो रहा था या दहेज की मांग थी तो रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई गई और इस मुद्दे पर दोस्तों व रिश्तेदारों से चर्चा क्यों नहीं की गई? अगर पीडि़त को गर्म चिमटे आदि से यातनाएं दी गई थीं तो मायके पक्ष ने तुरंत मेडिकल जांच क्यों नहीं कराई और उसे इस उत्पीड़न के बावजूद आरोपी परिवार के साथ रहने के लिए क्यों मजबूर किया? जब उसकी मृत्यु हो गई तो उसके परिवार के सदस्यों ने पहली ही मुलाकात में एसडीएम व जांच अधिकारी को उत्पीड़न और यातना की घटनाओं के बारे में उस तरह से क्यों नहीं बताया जैसा अब अदालत को बताया जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई अन्य कारण रहे हों जिस वजह से महिला ने आत्महत्या की। संभव है कि सीमा के माता-पिता ने यातना, उत्पीड़न और दहेज की मांग के जो आरोप लगाए हैं वह सब सही हों और वह विश्वाास करने के लायक भी हों, लेकिन क्या ऐसी स्थिति में बेसहारा युवती को ऐसे दरिंदों के पास बेबस छोड़ना चाहिए था जो उनकी बेटी पर अत्याचार कर रहे थे? ऐसा करना अपने आपमें अनुचित, अस्वीकार्य और अपराध है। न्यायाधीश कामिनी लॉ के मुताबिक कोई भी शिक्षित व संपन्न परिवार अपनी बेटी को जबरन मजबूर नहीं कर सकता कि वह ऐसे पति व सास-ससुर के साथ रहे जो उस पर अत्याचार करते हों। सीमा एक शिक्षित व रोजगार में लगी महिला थी। वह बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी गुजार सकती थी। फिर भी वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुई तो इसका दोषी कौन है? दरअसल, यह समाज की वह मानसिकता है जो महिला को दूसरे घर का समझते हैं और यह धारणा बनाए हुए हंै कि लड़की डोली में ससुराल जाए और वहां से अर्थी पर बाहर निकले। क्या लड़की के जीवन का एकमात्र मकसद किसी से ब्याह करके उसके परिवार की सेवा करना ही है। क्या वह व्यक्तिगत तौर पर आजाद इंसान नहीं है, जिसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं और सपने हैं। क्या विवाह के बाद लड़की का अपने मायके पर कोई अधिकार नहीं रहता है? जब तक इस किस्म के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तब तक दहेज के लिए उत्पीड़न व हत्याओं को रोक पाना संभव नहीं है। इसलिए न्यायाधीश कामिनी लॉ ने प्रश्न किया कि हमारे समाज में ऐसा क्यों है कि एक महिला की खुशी व उसके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण इस बात को समझा जाता है कि संबंध चाहे कितने भी खराब हो जाएं उसे तोड़ा नहीं जाना चाहिए। जब एक महिला का ब्याह हो जाता है तो जिस परिवार में वह पैदा हुई, जहां उसका पालन-पोषण हुआ वही उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं होते है, लेकिन जब वह मर जाती है तो अनेक किस्म की शिकायतें करने लगते हैं। दरअसल, जब तक घोड़ी चढ़कर बारातें लड़कियों के घर जाती रहेंगी तब तक दहेज की मांग पर विराम नहीं लगेगा और न ही विवाहित महिलाओं का उत्पीड़न खत्म होगा। महिलाओं को बराबरी का अधिकार व सम्मान उसी सूरत में मिल सकता है जब उनका अपने घर में उसी तरह से पालन-पोषण हो, जिस तरह से लड़कों का किया जाता है। वह ब्याह होकर अपनी ससुराल जाने की बजाय अपने घर जाएं, वह घर जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर स्वतंत्र रूप से विकसित किया हो। कहने का अर्थ यही है कि घर बनाने में पति व पत्नी का जब तक बराबर का योगदान नहीं होगा तब तक किसी लड़की न तो वास्तविक हक मिलेगा और न ही सही न्याय हो पाएगा, फिर बात चाहे मायके की हो, ससुराल की हो अथवा अदालत की। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Friday, June 1, 2012

गुमशुदा संवेदना


हम लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में रह रहे हैं, लेकिन जो घटनाएं घट रही हैं उनसे तो कभी-कभी यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या लोकतंत्र के पावन मंदिर में बैठे हुए सांसद संवेदना शून्य हो गए हैं। जिस संसद में एक नेता विशेष के कार्टून को लेकर हंगामा हो गया और राष्ट्र के करोड़ों रुपये खर्च करके यह विचार होता रहा कि जिन्होंने कार्टून बनाया उन्हें क्या दंड दिया जाए और भविष्य में कार्टून बनाने की आज्ञा दी जाए अथवा नहीं तथा जिन किताबों में कार्टून बने हैं उन्हें शिक्षालयों से वापस ले लिया जाए अथवा पढ़ाने दिया जाए, उसी संसद के समक्ष कुछ दिन पूर्व भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने यह दुखद रिपोर्ट भी रखी थी कि भारत में सन 2009 से लेकर 2011 के बीच 1 लाख 77 हजार 660 बच्चे लापता हुए और इनमें से अभी तक 55 हजार 470 बच्चों का कोई सुराग नहीं मिला। लापता बच्चों में 60 प्रतिशत लड़कियां हैं। ध्यान रहे कि अभी पंजाब और जम्मू-कश्मीर सरकार ने गुमशुदा बच्चों की संख्या नहीं बताई है। आज का सच यह है कि पूरे देश में रोजाना करीब 162 बच्चे लापता होते हैं। कटु सत्य यह भी है कि गायब हुए बच्चों में से अधिकतर गरीबों के बच्चे हैं। कौन नहीं जानता के देह व्यापार के धंधे में जो लड़कियां धकेली जाती हैं और जीवन भर नारकीय यातना तथा समाज का तिरस्कार सहती हैं, उनमें अधिकांश यही बच्चियां हैं, जिन्हें उठाया, बेचा जाता है और जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। हर चौक-चौराहे पर भिक्षा मांगते बच्चे मिलते हैं, कुछ कारों के शीशे चमकाने के बाद हाथ फैलाते हैं। इनमें कुछ विकलांग होते हैं। इन्हें देखते ही बहुत से लोगों का पर्स खुलता है और उनका हाथ कार के बाहर जाकर इन बच्चों पर रहम करके धन्य हो जाता है। अपने ही देश में मानव अंगों का व्यापार और दूसरे देशों में तस्करी भी जोर-शोर से हो रही है। सैकड़ों बच्चे मैं भी देखती हूं, आप भी देखते हैं, शायद सरकारी नहीं देखतीं। पूरे देश में बाल कल्याण मंत्रालय हैं, बाल संरक्षक आयोग हैं, बाल कल्याण समितियां हैं और केंद्र में मंत्री और आयोग हैं, पर उनकी किताब में इन बच्चों के लिए कोई स्थान नहीं। इन बच्चों को ढूंढ़ लेना, उन्हें माता-पिता के पास पहुंचा देना अथवा सरकार एवं समाजसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों में उनका पालन-पोषण कर देना कोई कठिन काम नहीं, केवल हृदय चाहिए, जो संवेदनापूर्ण हो। क्या भारत का गृह मंत्रालय यह बताएगा कि देश के किस-किस प्रांत में इन लापता बच्चों को खोजने और उनको बसाने के लिए कोई अलग विभाग है? पुलिस का कोई विंग लापता बच्चों के लिए विशेष रूप में बनाया गया है? क्या किसी महिला आयोग ने वेश्यालयों में जाकर उन महिलाओं की पीड़ा सुनी है, उनके माता-पिता के बारे में जानकारी ली है? मैंने स्वयं हैदराबाद में एक समाजसेवी महिला की छाया में बचाई हुई उन सैकड़ों लड़कियों को देखा है जो अब देह व्यापार के नर्क से निकलकर समाज की मुख्यधारा में आ गई हैं और दूसरों को भी रास्ता दिखा रही हैं। क्या यही काम भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों के मंत्री और अधिकारी नहीं कर सकते? गृह मंत्रालय केवल इतनी ही जानकारी दे दे कि देश के केंद्रीय आयोगों समेत कितने प्रांतों में महिला और बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष राजनेता नहीं अपितु सामाजिक कार्यकर्ता हैं। कौन नहीं जानता कि इन आयोगों की अध्यक्षता राजनीतिक तुष्टिकरण और रिश्तेदारियां निभाने के लिए की जाती हैं। क्या भारत सरकार एक शपथ पत्र जारी करेगी कि इन आयोगों में केवल देश और देशवासियों का दर्द दिल में लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों को ही महिला और बाल कल्याण का काम सौंपा गया है? अभी तो मेरा सवाल देश के सांसदों से है कि इस रिपोर्ट को वे कैसे कॉफी और चाय के साथ पी गए और पचा गए? (लेखिका पंजाब की पूर्व मंत्री हैं) लापता बच्चों की बढ़ती संख्या पर चिंता जता रही हैं लक्ष्मीकांता चावला