Monday, April 23, 2012

नशे की गिरफ्त में बच्चे


नशा मुक्ति के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों और युवाओं में मादक पदार्थो की लत बढ़ना चिंता की बात है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक में बच्चों द्वारा नशा करने के मामले सामने आ रहे हैं। बीते दिनों मानव व्यवहार विज्ञान संस्थान (इहबास) एवं मेडिकल साइंसेज विश्वविद्यालय ने दिल्ली स्कूल स्वास्थ्य योजना के तहत 24 निजी व 12 सरकारी स्कूलों के 11,234 बच्चों का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि 12 प्रतिशत बच्चे नशे की लत से जुड़े हैं। यह नशा सिगरेट या शराब का नहीं है। यह बच्चे नई तरह का नशा सूंघ कर ले रहे थे। विभिन्न शोधों से भी यही निष्कर्ष सामने आया है कि निम्न वर्ग के ही नहीं, बल्कि मध्यम एवं उच्च वर्ग के बच्चे इरेजर फ्लुइड, ग्लू, दर्द निवारक मलहम, पेंटथिनर, नेलपॉलिश रिमूवर जैसे नशे के आदी हैं। इसके अलावा पांच से आठ प्रतिशत युवा एम फेटेमाइन टाइप ऑफ स्टीमुलेट्स (एटीएस) का शिकार हैं और उनकी यह तादाद दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी वर्ष 2009 की रिपोर्ट बताती है कि देश में पहली बार नशा करने वालों की उम्र महज 10 से 11 वर्ष होती है और नशा करने वाले 37 प्रतिशत स्कूली विद्यार्थियों को यह पता होता है कि वे कौन सा मादक पदार्थ ले रहे हैं। सच तो यह है कि देश की भावी पीढ़ी को नशा पूरी तरह खोखला करता जा रहा है। नशे की गिरफ्त में संभ्रांत परिवारों से लेकर निचले तबके के परिवारों के बच्चे शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और सयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से देश में पिछले दशक में कराए गए सर्वे से भी खतरनाक होती स्थिति का पता चलता है। रिपोर्ट के मुताबिक नौंवीं कक्षा में आने से पहले 50 प्रतिशत किशोर किसी एक नशे का कम से कम एक बार सेवन कर चुके होते हैं। प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों ये बच्चे नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं? बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं बिना यह जाने कि कि उनके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। वह हर नई चीज को आजमाने की कोशिश करते हैं और यही प्रवृत्ति उन्हें अनजाने में नशे की ओर धकेल देती है। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहंुचते बच्चों के लिए परिवार की बजाय अपने दोस्तों का साथ अच्छा लगने लगता है और उनके द्वारा किए गए कार्य को वह स्वयं करने में झिझकते नहीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण, बच्चों का भावनात्मक रूप से अकेला होना है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं और एकल परिवार में माता-पिता के पास ज्यादा समय होता नहीं। ऐसे में अकेलेपन में बच्चे खुद को एक ऐसी दुनिया में धकेल रहे हैं जहां वहां कुछ पलों के लिए ही सही, खुद को जीवन की सच्चाई से दूर कर लेते हैं। वहीं निर्धन बच्चे अपनी दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में, संघर्ष करते-करते जीवन के सुखों को नशे में ढूंढने की कोशिश करते हैं। परंपरागत नशे के विपरीत सूंघकर किए जाने वाले नशे की सहज उपलब्धता नन्हे बच्चों को आसानी से अपनी गिरफ्त में ले लेता है। शोध बताते हैं कूड़ा बीनने वाले बच्चों में 75 प्रतिशत ड्रग एडिक्ट होते हैं। सूंघकर किए जाने वाले नशे की गिरफ्त में निरंतर बच्चों की संख्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि लंबे समय तक अभिभावकों को इसके बारे में पता ही नहीं चलता, क्योंकि इन नशों का प्रभाव तुरंत दिखाई नई देता। चिकित्सकों का मानना है कि लंबे समय तक इसका सेवन करने से दिमाग की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है तथा कैंसर का खतरा रहता है। किशोर बच्चों की ये आदत युवा होते-होते खतरनाक नशीले पदार्थ के सेवन में परिवर्तित हो जाती है। नशे की ओर बढ़ते इन बच्चों के कदमों को रोकने के लिए जरूरी है कि उन्हें स्नेह दिया जाए। यह हर अभिभावक का दायित्व बनता है कि किशोरावस्था की ओर बढ़ते अपने बच्चों के वह मित्र बनें और उनकी हर खुशी एवं परेशानी में उनके साथ रहें। भावनात्मक संबलता ही नशे की गिरफ्त में फंसते बच्चों को रोकने का उपाय है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) बच्चों में नशे की बढ़ती लत पर डॉ. ऋतु सारस्वत की टिप्पणी 

Monday, April 9, 2012

बेतहाशा बढ़ेगी भारत की शहरी आबादी


संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया की जनसंख्या और शहरीकरण के रुझान पर शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद 2025 तक एक करोड़ से अधिक आबादी वाले शहर होंगे। दुनिया में ऐसे नगरों की संख्या 37 तक पहुंच जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले चार दशक में भारत और चीन की शहरी जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है। इससे इन देशों को अपने नागरिकों को रोजगार, ऊर्जा, घर और बुनियादी ढांचे मुहैया कराने की नई चुनौती से जूझना होगा। राजधानी दिल्ली तीन करोड़ 29 लाख की आबादी के साथ दुनिया में जापान की राजधानी टोक्यो (तीन करोड़ 87 लाख) के बाद सर्वाधिक आबादी वाला दूसरा शहर होगा। मुंबई दो करोड़ 66 लाख के साथ चौथे और कोलकाता एक करोड़ 87 लाख के साथ 12वें स्थान पर होगा। बेंगलुरू की आबादी एक करोड़ 32 लाख, चेन्नई की एक करोड़ 28 लाख और हैदराबाद की एक करोड़ 16 लाख हो जाएगी तथा दुनिया में उनका स्थान क्रमश: 23वां, 25वां और 31वां होगा। दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले प्रथम दस शहर होंगे- टोक्यो, दिल्ली, शंघाई, मुम्बई, मेक्सिको सिटी, न्यूयार्क, साओ पाउलो, ढाका, बीजिंग और कराची। संयुक्त राष्ट्र से जारी आंकड़ों में मुख्य नगरों की आबादी में उपनगरों के निवासियों को भी शामिल किया गया है। दुनिया में शहरों और गांवों में जनसंख्या के बदलते अनुपात के बारे में कहा गया है कि 2050 तक शहरी आबादी में 72 प्रतिशत की वृद्धि होगी तथा यह वर्तमान तीन अरब 60 करोड़ से बढ़कर छह अरब तीस करोड़ हो जाएगी। ग्रामीण आबादी 2050 तक करीब तीन अरब होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट वि शहरीकरण संभावना समीक्षा 2011’ में कहा गया है कि अगले चार दशक में नगरीय जनसंख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी अफ्रीका और एशिया में होगी। शहरी और ग्रामीण आबादी का अनुपात इस समय 52 और 48 प्रतिशत है जो 2050 तक 67 प्रतिशत और 33 प्रतिशत हो जाएगा। वर्ष 2011 से 2030 के बीच दुनिया में शहरी आबादी में एक अरब 40 करोड़ की वृद्धि होगी। जिसमें चीन में करीब 28 करोड़ और भारत में करीब 22 करोड़ की बढ़ोतरी होगी। वर्ष 2010 से लेकर 2050 तक भारत में 49.7 करोड़ और अधिक शहरी आबादी जुड़ जाएगी।

बोझ नहीं, जीवन का विस्तार बुढ़ापा



इक्कीसवीं शताब्दी की एक विशेषता यह है कि इसमें लोगों की औसत आयु बढ़ गई है। साथ ही एक कालक्रम में आयु सीमा में हुए इस परिवर्तन से नयी पीढ़ी पर दबाव भी बढ़ गया है। भारत सहित दुनिया की जनसंख्या पर नजर डालें तो सन 2000 से 2050 तक पूरी दुनिया में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोगों की तादाद 11 फीसद से बढ़कर 22 फीसद तक पहुंच जाएगी। वि स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुमान के अनुसार वृद्ध लोगों की आबादी 605 मिलियन (60 करोड़ 50 लाख) से बढ़कर 2 बिलियन (2अरब) हो जाएगी। इन तथ्यों के आलोक में डब्लूएचओ ने इस वर्ष वि स्वास्थ्य दिवस की थीम बुढ़ापा और स्वास्थ्यनिर्धारित की है। इस मौके पर डब्लूएचओ के दक्षिण एशिया क्षेत्र के निदेशक डॉ. सामली प्लियाबांगचांग ने जारी अपने संदेश में कहा है कि, ‘बुढ़ापा या उम्र का बढ़ना एक जीवनपर्यन्त तथा अवश्यंभावी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बदलाव होता है। अब चूंकि एक बड़ी आबादी वृद्ध लोगों की है तो दुनिया भर में विभिन्न सरकारों और योजनाकारों को तदनुरूप योजनाएं और नीतियां बनानी चाहिए।
डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन 2050 में 300 मिलियन (30 करोड़) यानी 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है। बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी हैं। जैसे 60 वर्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है। 80 वर्ष से ज्यादा की उम्र वाले वृद्ध सन 2050 तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे। अगले 5 वर्षो में ही 65 वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की तादाद पांच वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी। सन 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें। डब्लूएचओ की नई चिन्ताओं में दुनिया में बढ़ते वृद्धों की ज्यादा संख्या है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि बढ़ती उम्र, बुढ़ापा अथवा अधेड़ उम्र के ज्यादा लोगों की वजह से डब्लूएचओ परेशान है। दरअसल यह मुद्दा समय से पहले चेतने और समय रहते समुचित प्रबन्धन करने का है। संगठन की मौजूदा चिंता भी इसी की कड़ी है। वैीकरण के दौर में एक बात तो समान रूप से सर्वत्र देखी जा रही है कि अर्थ अथवा धन ने मानवीयता एवं संवेदना पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। धन और सम्पत्ति के सामने सम्बन्धों व मानवता की हैसियत घटती जा रही है। ऐसे संवेदनहीन होते जा रहे समाज में यदि अधेड़ उम्र के लोगों की तादाद ज्यादा होगी तो कई मानवीय दिक्कतें भी बढ़ेंगी इसलिए इनकी सामाजिक सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा वृद्धावस्था से जुड़े अन्य सभी पहलुओं पर सम्यक दृष्टि तो डालनी ही होगी। संगठन की मौजूदा चिन्ता भी यही है इसलिए इस वर्ष अपने स्थापना दिवस पर संगठन ने बुढ़ापा एवं स्वास्थ्यकी थीम पर स्लोगन दिया है- दीर्घ जीवन के लिये अच्छा स्वास्थ्य (गुड हेल्थ एड्स लाइफ टू इयर्स) स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि बुढ़ापे को देखें तो यह कई तरह से संवेदनशील उम्र है। इस दौरान यानी 50 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में कई तरह के क्रियात्मक परिवर्तन होते हैं। जैसे गुर्दे, जिगर, फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। दांत कमजोर होने लगते हैं, आंखों की रोशनी, सुनने की क्षमता, यौन क्षमता, याददाश्त आदि कमजोर होने लगते हैं। वृद्ध होते व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता भी कम होने लगती है। ऐसे में व्यक्ति तथा उसके परिजनों दोनों के लिए बुढ़ापा समस्या बन जाता है। ऐसे में बुढ़ापे से सम्बन्धित विभिन्न स्वास्थ्य एवं सामाजिक पहलुओं की विचेचना जरूरी है। डब्लूएचओ की मौजूदा चिन्ता में केवल विकासशील देश ही नहीं, विकसित देशों के वृद्ध भी शामिल हैं। दोनों देशों के वृद्धों की अपनी- अपनी समस्याएं हैं। विकसित देशों में जहां वृद्धों को आर्थिक दिक्कत अपेक्षाकृत कम है, वहीं विकासशील देशों में उनकी मुख्य समस्या आर्थिक ही है। सामाजिक सुरक्षा के अभाव में विकासशील अथवा गरीब देश के वृद्धों की स्थिति बहुत दर्दनाक है। संगठन ने दुनिया भर के देशों की सरकारों से अपील की है कि वे अपने- अपने क्षेत्र में ऐसी योजनाएं बनाएं ताकि वृद्धावस्था लोगों को जीवन बोझ न लगे। संगठन ने वृद्धावस्था व उससे जुड़ी समस्याओं से निबटने के लिए कुछ बिन्दु सुझाए हैं। इनमें समय रहते वृद्ध होते लोगों की सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा आदि के लिए बिन्दुवार नीतियां और कार्यपण्राली बनाने की जरूरत है। इस पहलू से जुड़ा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वृद्ध लोगों की कार्यकुशलता तथा अनुभव को उपयोग में लेने की नीति पर कई देश काम कर रहे हैं। भारत में भी वृद्ध लोगों के प्रति सकारात्मक नजरिए के लिए कई स्वयंसेवी संगठनों की ओर से अभियान चलाया जा रहा है। बढ़ती उम्र अथवा वृद्धावस्था को लेकर पश्चिमी समाजों की अवधारणा आज भी अमानवीय और क्रूर है। भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में वृद्धों के प्रति शुरू से ही सकारात्मक नजरिया रहा है। वृद्धाश्रम या ओल्ड होम की परिकल्पना मूलत: पश्चिम की है, भारतीय नहीं पर पश्चिमी समाज भी अब यह महसूस कर रहा है कि ओल्ड होम्सवृद्धावस्था की समस्याओं का समाधान नहीं हैं। इसलिए ज्यादा वृद्धों वाले समाज को विशेष रूप से इस योजना पर काम करना पड़ेगा कि वृद्ध लोग कैसे सार्थक और सुकून भरा जीवन जी सकें। समाज कल्याण और बाल विकास की अनेक योजनाएं हैं जिसमें वृद्धों को महत्वपूर्ण भूमिका के लिए आग्रह किया जा सकता है। इस प्रकार जहां वे सक्रिय और उत्पादक जीवन जी पाएंगे, वहीं समाज को एक अनुभवी तथा परिपक्व सेवा भी मिल जाएगी। डब्लूएचओ की इस थीम (बुढ़ापा और स्वास्थ्य) का मतलब यह भी है कि उम्र कोई बाधा नहींअथवा रिटार्यड बट नाट टार्यड। दरअसल तकनीक व आधुनिक विकास ने व्यक्ति को ज्यादा उम्र तक जीने का वरदान दे दिया है। जाहिर है युवा और वृद्ध के बीच एक नया अन्तराल पैदा हुआ है। यह अन्तराल विकास की नयी इबारत लिख सकता है। आवश्यकता है कि हम पीढ़ियों और उम्रों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकें। बुढ़ापा बोझ तब होता है जब परिवारों में समझ और संवेदना का अभाव हो। हमें साधन और समृद्धि के साथ- साथ संवेदना और प्राकृतिक सत्य को भी महत्व देना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि विविद्यालयों एवं सामाजिक संस्थाओं में अलग-अलग विषयों के लिए विशेष पाठ्यक्रम या व्यावहारिक हॉबी की कक्षाएं चलाई जा सकती हैं। कहते हैं कि शिक्षा का पहला दौर जीवन की तैयारी है और इसका दूसरा दौर मृत्यु की तैयारी होना चाहिए। हम जीवन की तमाम योजनाएं बनाते हैं लेकिन यह जानते हुए भी कि मृत्यु निश्चित है’, इस पर तनिक भी नहीं सोचते। यदि हमने मृत्यु का पाठ ठीक से पढ़ लिया तो यह जीवन की ही तरह सरल लगने लगेगा। फिर बुढ़ापा समस्या नहीं, एक उत्सव की तरह होगा। वि स्वास्थ्य दिवस के बहाने यदि हम बुढ़ापे के सवालों को ठीक से समझ सकें तो शायद हम बुढ़ापे को समस्या नहीं, बल्कि जीवन के एक आवश्यक अंग की तरह देखेंगे और यही आज की जरूरत भी है। इसलिए बुढ़ापे को स्वास्थ्य संगठन से जोड़ने की जरूरत है। हम सबको इस अभियान में लगना चाहिए क्योंकि हम सब भी धीरे-धीरे बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे हैं।