कुछ दिन पहले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन ने अपने 66वें सर्वेक्षण दौर की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में एक अत्यंत चिंताजनक बात सामने आई है रोजगार में बढ़ती आकस्मिकता या यो कहें कि अस्थिरता। नमूना सर्वेक्षण संगठन समय-समय पर रोजगार और बेरोजगारी से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। हाल की रिपोर्ट के अनुसार, 2004-05 और 2009-10 के बीच आकस्मिक श्रमिकों की संख्या में 219 लाख की वृद्धि हुई। पिछले दौर की तुलना में यह वृद्धि काफी ज्यादा है। स्थायी यानी वेतन पाने वाले श्रमिकों की बात करें तो 2009-10 के दौर में यह वृद्धि पहले से आधी यानी मात्र 58 लाख की ही थी। स्वरोजगार युक्त श्रमिकों जिसमें अधिकतर किसान, लघु और कुटीर उद्योगपति और व्यापारी आते हैं, की संख्या में 251 लाख की कमी दर्ज की गई है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जब आकस्मिक रोजगार वाले श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होती है तो रोजगार का स्तर घटता है और श्रमिकों के जीवन स्तर में कमी आती है। प्रतिशत आधार पर देखें तो पाते हैं कि 1993-94 में ग्रामीण क्षेत्रों में आकस्मिक रोजगार केवल 35.6 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 18.3 प्रतिशत था। 2009-10 में यह ग्रामीण क्षेत्रों में 38.6 प्रतिशत पहुंच गया और शहरी क्षेत्रों में 17.5 प्रतिशत रहा। 2004-05 की तुलना में 2009-10 में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आकस्मिकता वाला रोजगार तेजी से बढ़ा है। गौरतलब है कि यह प्रतिशत 2004-05 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमश: 35.0 और 15.1 प्रतिशत ही था। नई आर्थिक नीति और भूमंडलीकरण के पैरोकार तो यह मानने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते कि इस आर्थिक नीति में कुछ गलत भी हो सकता है। वे तो लगातार बढ़ती आर्थिक संवृद्धि का दंभ भरते हैं। गौरतलब है कि रोजगार में घटियापन उन्हीं वर्षो में सबसे ज्यादा बढ़ा, जब आर्थिक संवृद्धि सबसे ज्यादा तेज थी। 2004-05 और 2009-10 में आर्थिक संवृद्धि की दर औसत रूप में 8 से 9 प्रतिशत रही, जबकि पूर्व के वर्षो में वह उससे कहीं कम थी। लेकिन पूर्व के वर्षो में आकस्मिक रोजगार घटा था। आमतौर पर माना जाता है कि आर्थिक संवृद्धि के साथ रोजगार भी बढ़ता है, लेकिन वर्तमान आर्थिक संवृद्धि अभी तक रोजगारविहीन आर्थिक संवृद्धि ही मानी जाती है, क्योंकि इसमें जीडीपी तो बढ़ी, लेकिन रोजगार नहीं। पिछले पांच वर्षो में रोजगार में पहले से थोड़ी ज्यादा वृद्धि देखने को मिली, लेकिन वह रोजगार स्तरीय रोजगार नहीं था। वास्तव में इस कालखंड में कम मजदूरी वाला आकस्मिक रोजगार ही बढ़ा। यदि हम इस आर्थिक संवृद्धि की तस्वीर देखते हैं तो इस बात का उत्तर साथ ही साथ मिल जाता है। इस आर्थिक संवृद्धि में हमारी आधी से अधिक आबादी, जो कृषि पर निर्भर करती है, की कोई भागीदारी नहीं थी। जबकि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में 8 से 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, कृषि की स्थिति सोचनीय ही बनी रही और उसमें मात्र शून्य से तीन प्रतिशत (औसतन 2 प्रतिशत) संवृद्धि दर्ज की गई। साथ ही साथ अर्थव्यवस्था के शेष क्षेत्रों में भी आर्थिक संवृद्धि संगठित क्षेत्रों और कॉरपोरेट क्षेत्र तक ही सीमित रही। पूंजीपतियों का लाभ और कुछ खास लोगों के वेतन बढ़े, लेकिन बहुसंख्यक लोगों के रोजगार का स्तर या तो बढ़ नहीं पाया या घट गया। आकस्मिकता का मतलब आकस्मिक रोजगार यानी जहां श्रमिकों को काम में स्थायित्व और अन्य सुविधाओं का अभाव हो। ठेकेदारी व्यवस्था में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक जो गार्ड, सफाई कर्मचारी, ड्राइवर आदि के रूप काम करते हैं, वे सभी इसी श्रेणी में आते हैं। आकस्मिक रोजगार घटिया इसलिए माना जाता है, क्योंकि स्थायी कर्मचारियों की अपेक्षा आकस्मिक श्रमिकों की मजदूरी कम होती है और इसमें वृद्धि भी कम होती है। हम देखते हैं कि हमारे आसपास ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत काम करने वाले गार्ड, सफाई कर्मचारी आदि अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं और उनका वेतन भी गुजारे लायक वेतन से कहीं कम होता है। इन्हें मजदूरी के अतिरिक्त भत्ते आदि भी नहीं मिलते। दूसरी ओर वेतनभोगी स्थायी मजदूरों को बोनस, मकान किराया भत्ता, दवा और इलाज के लिए खर्च, मुफ्त टेलीफोन, यातायात भत्ता/कार आदि तमाम प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं या इन सुविधायों के बाजार मूल्य के आधार पर भरपाई होती है। आकस्मिक श्रमिकों की निम्न मजदूरी जिस मजदूरी पर आकस्मिक श्रमिकों का गुजारा चलता है, वह भी बहुत ही निम्न स्तर की होती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, तीन प्रकार के अस्थायी मजदूरों के लिए अलग-अलग मजदूरी की गणना की गई है। शहरी क्षेत्रों में स्थायी कर्मचारियों की मजदूरी औसत 365 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में यह 232 रुपये आंकी गई है, जबकि निजी क्षेत्र के कार्यो के लिए भाड़े पर लिए गए आकस्मिक मजदूरों की मजदूरी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में क्रमश: 122 रुपये और 93 रुपये ही है। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में यह मजदूरी पुरुषों के लिए 98 रुपये और महिलाओं के लिए 86 रुपये थी। रोजगार गारंटी योजना और सरकारी प्रकल्पों पर भाड़े पर लिए गए मजदूरों की मजदूरी क्रमश: पुरुषों और महिलाओं के लिए मात्र 91 रुपये और 87 रुपये आंकी गई है। इसके अलावा यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि दिहाड़ी मजदूरों को वर्ष भर काम नहीं मिलता। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भी काम तो केवल 100 ही दिन मिल पाता है। शेष मजदूरों को तो उतना भी काम नसीब नहीं होता। वेतनभोगी मजदूरों से काम के दिनों में एक चौथाई से एक तिहाई ही मजदूरी और वास्तव में वर्ष भर में मात्र 100 दिनों से भी कम रोजगार की स्थिति देश में इन मजदूरों की बदतर स्थिति बयान करती है। नई आर्थिक नीति है दोषी इसके साथ मजदूरों में बढ़ती आकस्मिकता और अस्थायित्व अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वास्तव में नई आर्थिक नीति के चलते कृषि, लघु और कुटीर उद्योगों में स्वरोजगार घट रहा है। इसके साथ सरकारों द्वारा किसानों की भूमि का जबरन अधिग्रहण, किसान से उसका परंपरागत रोजगार छिन रहा है। ऐसे में स्वरोजगार युक्त श्रमिकों में मात्र पांच वर्षो में 251 लाख की कमी और उन स्वरोजगार युक्त लोगों का आकस्मिक श्रमिक के रूप में बदलाव देश में आम मजदूर और किसान की बदहाली की ओर इशारा कर रहा है। नई आर्थिक नीति के पैरोकारों को विचार करना होगा कि केवल जीडीपी आधरित आर्थिक संवृद्धि से आम आदमी के जीवन में सुधार नहीं हो सकता। लेकिन जब इस जीडीपी को बढ़ाने की कवायद में आम आदमी गरीबी की ओर जा रहा हो तो उस नीति का परित्याग कर जनोन्मुखी आर्थिक नीति बनानी होगी। कृषि, लघु उद्योग और अन्य स्वरोजगार प्रदान करने वाले क्षेत्रों का विकास और बचाव ही एकमात्र उपाय है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं).
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