देश के प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिरों से निकल रहे धन-दौलत के खजाने चकित करने वाले हैं। केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम के श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गर्भ गृह से निकले खजाने से साबित होता है कि भारत को सोने की चिडि़या यों ही नहीं कहा गया है? यवन आक्रांता महमूद गजनबी से लेकर फिरंगियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को लूटने की यात्राएं बेवजह नहीं कीं। भारत में सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात के अकूत भंडार थे। हालांकि भारत जब सोने की चिडि़या कहलाता था तब भी गांवों में सामंती व्यवस्था के चलते ग्रामों में गरीबी पसरी थी, लेकिन भगवान तब भी अमीर थे। आज जब मंदिरों के चढ़ाए जाने वाले चढ़ावों की जानकारी बाहर आ रही है, तब भी हैरानी होती है कि इन मंदिरों में चढ़ावों की संपत्ति विदेशी बैंकों में जमा काले धन की कुल जमा संपत्ति से कहीं ज्यादा है। अकेले पद्मनाम स्वामी मंदिर के गुप्त खजाने ने करीब एक लाख करोड़ की संपदा उगली है। यह धन देश के कई राज्यों के वार्षिक बजट से ज्यादा है। यदि इस धनराशि से राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किए जाने का सिलसिला शुरू हो जाए तो कई राज्यों का कायाकल्प हो सकता है, लेकिन आस्था के चलते क्या जंग खा रही इस विपुल धनराशि को इंसानी सरोकारों से जोड़ना संभव है? मंदिरों से मिल रहे खजानों के बाद अब इन तथ्यों को झुठलाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है कि भारत में यवन, तुर्क, मुगल और अंग्रेज भारत को लूटने के नजरिए से ही आए थे। क्योंकि देश के प्रमुख राष्ट्रीयकृत बैंकों और सरकारी कोषालयों से कई गुना ज्यादा खजाना धार्मिक स्थलों के तहखानों में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि देश आर्थिक रूप से हमेशा संपन्न रहा है। श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के खजाने ने फिलहाल सबसे अमीर माने जाने वाले मंदिर तिरुपति बालाजी को पीछे छोड़ दिया है। पद्मनाभ मंदिर के छह में से पांच तहखानों से एक लाख करोड़ की संपत्ति मिल चुकी है। अभी कुछ और तहखानों को खोला जाना बाकी है। इस मंदिर से अभी तक जो धनराशि मिली है, उसका यदि तुलनात्मक मूल्यांकन किया जाए तो यह देश के कई राज्यों के सालाना बजट से कहीं ज्यादा है। दिल्ली, झारखंड और उत्तराखंड के कुल वार्षिक से भी यह राशि 23 हजार करोड़ रुपये ज्यादा है। देश की सबसे बड़ी मनरेगा परियोजना का बजट भी इससे आधा है। तिरुपति बालाजी मंदिर के पास भी इतनी दौलत है कि वह देश के कुल बजट के पांचवें हिस्से तक पहंुच गई। इस मंदिर के खजाने में अभी 50 हजार करोड़ रुपये जमा हैं। एक साल में करीब 650 करोड़ कमाने वाले अरबपति बालाजी भगवान दुनिया में सबसे धनपति भगवान हैं। यह मंदिर अब विदेशी मुद्रा की आय का भी जरिया बन रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया जैसे 12 देशों की मुद्रा चढ़ावे के रूप में यहां उपलब्ध है। इस मंदिर की करीब एक सौ करोड़ रुपये की वार्षिक कमाई अकेले मुंडन कराने आए श्रद्धालुओं के बाल काटकर बेचने से होती है। श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर से निकले खजाने पर किसका अधिकार हो, यह बहस भी छिड़ गई है। कुछ तर्कशास्त्री तर्क दे रहे हैं कि आखिरकार किसी भी देश में मौजूद कोई भी संपत्ति राष्ट्र की धरोहर होती है, इसलिए इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर देश के पिछड़े क्षेत्रों के कमजोर तबकों व वंचित समाज के कल्याण में लगाया जाए। इन तबकों के बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाले विद्यालयों में धनाभाव के कारण प्रवेश नहीं मिल पाता। लिहाजा, अच्छे स्कूल खोले जाने में इस राशि को खर्च किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न होने के कारण इस राशि को स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च किए जाने की भी पैरवी की जा रही है। हालांकि इस दौलत को जनता की भलाई में लगाने की वकालत करने वाले एक तर्कशास्त्री यू कलानाथन को कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार भी होना पड़ा। उनके घर में तोड़फोड़ की गई। इस तरह के आक्रोश को तार्किक नहीं कहा जा सकता है। यह विपुल राशि यदि चलन में नहीं लाई जाती है तो यह खोटी कहलाएगी और इसकी सार्थकता के कोई मायने नहीं रह जाएंगे। भगवान को अर्पित दौलत से यदि गरीबों का कल्याण होता है तो इससे भला कोई दूसरा काम नहीं हो सकता है। हालांकि बहस इस बात पर हो सकती है कि इस अकूत धन-संपदा पर पहला हक किसका हो, राज्य सरकार का या केंद्र सरकार का? चूंकि यह संपदा केरल के मंदिर से हासिल हुई है, इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि इस पर पहला अधिकार राज्य सरकार का है। श्री पद्मनाभ मंदिर से मिली दौलत केरल के कुल वार्षिक बजट से दोगुनी है। यदि केरल का कर्ज निपटाने में इस राशि का उपयोग किया जाए तो कर्ज चुकता होने बाद भी राज्य सरकार के पास 30 हजार करोड़ की संपत्ति बची रहेगी। हालांकि इस दिशा में यकायक कोई राय जताकर फैसला ले लेना जल्दबाजी होगा। वैसे भी करीब डेढ़ सौ सालों से बंद तहखानों के कपाटों को सुप्रीमकोर्ट के आदेश से खोला गया है। दौलत की गणना और जांच-पड़ताल भी कोर्ट की निगरानी में चल रही है। अभी एक तहखाना खुलना बाकी भी है। इतिहासकारों का यह मानना है कि यह खजाना त्रावणकोर के राज परिवार का है। उन्होंने लुटेरों से इसे सुरक्षित रखने की दृष्टि से तिलिस्मी शिल्प से बनाए गए तलघर में रखा था, क्योंकि इस तहखाने का रास्ता किवाड़ों से बंद न होकर ग्रेनाइट की मजबूत चट्टानों से ढका था। इन चट्टानों को खिसकाने पर एक गुप्त कक्ष मिलता है, जिसका रास्ता एक सुरंग से होकर गुजरता है। इस सुरंग में एक बार एक ही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। जो खजाना अब तक मिला है, वह कक्ष के फर्श पर बिखरा था। कुछ खजाना दीवारों में खचीं लोहे की तिजोरियों में बंद बताया जा रहा है। इनमें से कुछ तिजोरियां खोली जानी हैं। इन तिजोरियों के ऊपर सांप के चिह्न बने हुए हैं। इन चिह्नों को देखकर राजपरिवार के वंशज, पुजारी और कुछ धर्मभीरू यह आशंका जता रहे हैं कि इन तिजोरियों को खोला गया तो अपशकुन होगा, जिसके प्रभाव से राज्य में सूखा पड़ सकता है या कोई भयंकर प्राकृतिक आपदा आ सकती है। लेकिन ये आशंकाएं भ्रामक हैं। इन शगुन-अपशकुनों व चमत्कारों के फेर में भारत ने बहुत खामियाजा भुगता है। इन थोथे भ्रमों से भारतीय इतिहास भरा पड़ा है। जब भारत में पहला लुटेरा महमूद गजनवी आया था तो उसने सशस्त्र लुटेरों के साथ सोमनाथ के विश्व प्रसिद्ध मंदिर पर हमला बोला। तब मंदिर के पंडे-पुजारियों ने मंदिर की सुरक्षा में तैनात सैन्य बलों को भरोसा जताया कि भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और हमलावर शिव की क्रोधाग्नि से भस्म हो जाएंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं हुआ। आक्रमणकारियों ने पवित्र शिवलिंग तो खंडित किया ही, मंदिर की अकूत व बहूमूल्य धन-संपदा भी लूटकर ले गए। लिहाजा, तहखाने में उपलब्ध प्रत्येक कक्ष और तिजोरी को बिना किसी दैवीय शक्ति के भय के खोला जाना जरूरी है। इस मंदिर की दौलत को आम आदमी की भलाई में लगाने की प्रेरणा हमें पुट्टापर्थी के सत्य साई ट्रस्ट, तिरुपति बालाजी और शिरडी के साई बाबा मंदिर न्यास से लेनी चाहिए। सत्य साई न्यास के उच्च गुणवत्ता वाले बड़े अस्पताल और चिकित्सा महाविद्यालय तो हैं ही, 750 ग्रामों की पेयजल व्यवस्था भी यह ट्रस्ट अपने खर्चे से उठाता है। तिरुपति बालाजी मंदिर न्यास भी कई शिक्षा व स्वास्थ्य संस्थानों का संचालन कर गरीब बच्चों को शिक्षित तो कर ही रहा है, स्थानीय लोगों को बड़े स्तर पर रोजगार भी दे रहा है। इधर महाराष्ट्र के भोईरपाड़ा में शिरडी के ट्रस्ट ने सुजलान कंपनी के साथ गठबंधन करके बिजली उत्पादन के लिए पवनचक्कियों की एक पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी है। इस परियोजना से प्रतिमाह लाखों यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इस परियोजना में ट्रस्ट ने 15 करोड़ की धनराशि का पूंजी निवेश किया था। बहरहाल, यदि मंदिरों में जंग खा रही अटूट संपत्ति को पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल संग्रहण और बिजली उत्पादन से जुड़े क्षेत्रों में लगाया जाता है तो यह राशि राष्ट्र निर्माण से जुड़ी बुनियादी समस्याओं के काम आएगी और आम आदमी की भगवान के प्रति आस्था भी मजबूत होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Thursday, July 7, 2011
Tuesday, July 5, 2011
बालश्रम का कलंक
आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी जो बातें भारत के लिए शर्म की बहुत बड़ी वजह बनी हुई हैं बालश्रम को अगर उनमें सबसे ऊपर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। आज भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने की उम्र में खेतों से लेकर होटलों और खतरनाक उद्योगों तक में अत्यंत विकट परिस्थितियों में जीतोड़ मेहनत करने के लिए मजबूर हैं। बेफिक्री की उम्र में ही उनके ऊपर इतने तरह की फिक्र लदी हुई हैं कि उनके बोझ तले दब कर वे अपने सोचने-समझने और यहां तक कि सुख-दुख को महसूस करने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं। बालश्रम के लिए जिम्मेदार लोग बच्चों से उनका बचपन तो छीन ही रहे हैं, इससे भी ज्यादा चिंताजनक इसके साथ जुड़े मानव व्यापार और यौन शोषण के पहलू हैं। देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे ही कुछ तत्व हाल ही में चंडीगढ़ से पकड़े गए। उनके चंगुल से कुछ बच्चे भी छुड़ाए गए। सबसे गंभीर बात यह है कि देश में बालश्रम के खिलाफ कड़े कानून होने और इस संदर्भ में जनजागरूकता के तमाम प्रयासों के बावजूद इस दुखद सच का अंत नहीं हो रहा है। सवाल यह है कि आखिर क्यों? चंडीगढ़ में जिन दो लोगों को चौदह मासूम बच्चों के साथ पकड़ा गया, उनमें एक लेह और दूसरा बिहार के गया जिले का रहने वाला है। इनके चंगुल से छुड़ाए गए सभी बच्चे बिहार के बदहाल परिवारों से हैं। शुरुआती जांच में मालूम यह हुआ है कि यह गिरोह बिहार से मासूम बच्चों को लाकर इन्हें बेहद कम मजदूरी पर होटलों में नौकरी पर रखवाता था और उसमें से भी उनकी मजदूरी का बड़ा हिस्सा खुद हड़प लेता था। इस बार छुड़ाए गए बच्चों की उम्र छह से सत्रह साल के बीच है और इन्हें हिमाचल प्रदेश के होटलों में मजदूरी पर रखवाया जाना था। पुलिस के मुताबिक यह गिरोह पिछले तीन साल से सक्रिय था और पहले भी यह बच्चों को ला चुका है जिन्हें होटलों में नौकरी पर रखा गया है। पुलिस को यह मामला सिर्फ बालश्रम का ही नहीं, बल्कि इनके तार उन्हें बाल यौन अपराध से भी जुड़े हुए दिख रहे हैं। हालात को देखते हुए इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। अगर इस बात में दम हुआ तो समझा जा सकता है कि देश में बदहाल परिवारों के बच्चों के साथ कितने अत्याचार हो रहे हैं और स्थिति वास्तव में कितनी बीभत्स है। इसी बीच, बाल मजदूरी सप्ताह के दौरान पंजाब में श्रम विभाग द्वारा कई जगह छापे भी मारे। इस बीच छह सौ से ज्यादा बाल मजदूरों को छुड़ाया गया। इनमें चार सौ से अधिक बच्चे खतरनाक उद्योगों में लगे हुए थे। इस मामले में सबसे खराब स्थिति लुधियाना की पाई गई, जहां सबसे अधिक बाल श्रमिक पाए गए। पंजाब और चंडीगढ़ में की गई कार्रवाइयों के दौरान मिली ये जानकारियां तो सिर्फ बानगी भर हैं। सच तो यह है कि देश का एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जहां बालश्रम का शोषण न किया जा रहा हो। जहां कहीं भी बालश्रम का उपयोग हो रहा है, हर उस जगह सच का एक पहलू यह है कि वहां शोषण ही हो रहा है। क्योंकि बच्चों को आम तौर पर हर जगह कड़ी मेहनत के बदले सामान्य से बहुत कम मजदूरी दी जाती है। किसी काम से ना-नुकर करने पर कई जगह तो उनकी पिटाई भी होती है। इसके अलावा भी उन्हें तरह-तरह से सजाएं दी जाती हैं। खतरनाक उद्योगों में तो ये लगे ही हुए हैं, कई जगह यौन शोषण के शिकार भी हो रहे हैं। कुछ राज्य तो इस मामले में बदनाम ही हो चुके हैं और इस दिशा में सरकारी तंत्र भी कुछ कर नहीं पा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बालश्रम का मसला किसी भी समाज में कानून से ज्यादा सामाजिक ताने-बाने और देश की आबादी के एक बड़े भाग की आर्थिक हैसियत से जुड़ा हुआ है। यह सामान्य बात नहीं है मां-बाप खुद ही अपने बच्चों को न केवल खुद से बहुत दूर खतरनाक जगहों पर नौकरी के लिए भेज देते हैं, बल्कि ऐसी भी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिनमें लोगों ने अपने बच्चों को बेच तक दिया है। इससे ज्यादा दुखद सच और क्या हो सकता है? लेकिन सोचने की बात यह है कि आखिर वे कौन सी स्थितियां होती हैं जो लोगों को अपने बच्चे तक बेचने के लिए मजबूर कर देती हैं। आखिर सामान्य स्थिति में तो कोई ऐसा कर नहीं सकता। वही लोग ऐसा करते हैं जो दारुण दुख के दौर से गुजर रहे होते हैं। दाने-दाने को मोहताज आदमी के पास जब कोई और चारा नहीं होता तभी वह अपने कलेजे पर पत्थर रख कर ऐसा फैसला कर पाता होगा। बेशक यह उसकी ओर से भी एक जघन्य अपराध ही है, लेकिन उन हालात का क्या किया जाए तो किसी को ऐसे अपराध करने और खुद अपनी ही नजर में गिर जाने के लिए मजबूर करते हैं? क्या वे सिर्फ कानून बना देने से खत्म हो जाएंगे? अगर हालात पर गौर किया जाए तो पाया जाएगा कि ऐसे गिरोहों के शिकार अधिकतर बच्चे ग्रामीण परिवेश से आते हैं। वे या तो भूमिहीन खेत मजदूरों या फिर छोटे किसानों के परिवारों से आते हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि देश में किसानों की क्या दशा है। बड़ी संख्या में किसान कर्ज से दबे हुए हैं। जिन क्षेत्रों अकाल या बाढ़ की मार किसानों को झेलनी पड़ती है, वहां तो हालात और भी बुरे हैं। सबसे मुश्किल बात यह है कि गांवों में मौजूद गरीब परिवारों के पास रोजगार के दूसरे उपयुक्त साधन भी नहीं हैं। केंद्र और राज्य सरकारें गांवों में ही लोगों को रोजगार देने के लिए कुछ योजनाएं जरूर चला रही हैं, लेकिन उनका भी वास्तविक लाभ जरूरतमंद लोगों तक पूरी तरह पहुंच नहीं पा रहा है। सरकारी योजनाओं में लगे धन का एक बड़ा हिस्सा तो भ्रष्टाचार का अजगर ही निगल जाता है। हकीकत यही है कि अधिकतर जगहों पर बेसहारा परिवारों को भगवान के सहारे ही छोड़ रखा गया है। जाहिर है, इन हालात के रहते बालश्रम पर काबू पाना संभव नहीं होगा। क्योंकि जरूरत सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि वे हालात बदलने की है जिनके चलते यह हो रहा है। बच्चों को सिर्फ एक जगह से छुड़ा लेने से काम चलने वाला नहीं है। आखिर इसके बाद उनका क्या होगा, यह भी सोचना होगा। बच्चों को बेचे जाने और मजदूरी के नाम पर शोषण का शिकार होने से रोका जा सके, इसके लिए जरूरी है कि उनके माता-पिता को रोजगार उपलब्ध कराए जाएं। ऐसी स्थितियां बनाई जाएं कि बच्चों को इसके लिए मजबूर न होना पड़े। यह तब संभव नहीं होगा जब तक कि विकास के मामले में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर नहीं किया जाता। शर्मनाक बात यह है कि इसमें कई जगहों पर राजनेता ही आड़े आने लगते हैं। अपनी राजनीति चमकाने के लिए वे औद्योगिक परियोजनाएं स्थापित होने ही नहीं देते और दूसरी तरफ खेती के हालात सुधारने के लिए कोई सार्थक और ठोस उपाय नहीं करते। बालश्रम जैसे शर्मनाक कलंक से देश को मुक्ति मिल सके, इसके लिए राजनेताओं को अपने क्षुद्र स्वार्थो से ऊपर उठकर खुद मुकम्मल योजना तैयार करनी होगी। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं).
Monday, July 4, 2011
मेहनतकशों के साथ ज्यादती क्यों
कुछ दिन पहले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन ने अपने 66वें सर्वेक्षण दौर की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में एक अत्यंत चिंताजनक बात सामने आई है रोजगार में बढ़ती आकस्मिकता या यो कहें कि अस्थिरता। नमूना सर्वेक्षण संगठन समय-समय पर रोजगार और बेरोजगारी से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। हाल की रिपोर्ट के अनुसार, 2004-05 और 2009-10 के बीच आकस्मिक श्रमिकों की संख्या में 219 लाख की वृद्धि हुई। पिछले दौर की तुलना में यह वृद्धि काफी ज्यादा है। स्थायी यानी वेतन पाने वाले श्रमिकों की बात करें तो 2009-10 के दौर में यह वृद्धि पहले से आधी यानी मात्र 58 लाख की ही थी। स्वरोजगार युक्त श्रमिकों जिसमें अधिकतर किसान, लघु और कुटीर उद्योगपति और व्यापारी आते हैं, की संख्या में 251 लाख की कमी दर्ज की गई है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जब आकस्मिक रोजगार वाले श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होती है तो रोजगार का स्तर घटता है और श्रमिकों के जीवन स्तर में कमी आती है। प्रतिशत आधार पर देखें तो पाते हैं कि 1993-94 में ग्रामीण क्षेत्रों में आकस्मिक रोजगार केवल 35.6 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 18.3 प्रतिशत था। 2009-10 में यह ग्रामीण क्षेत्रों में 38.6 प्रतिशत पहुंच गया और शहरी क्षेत्रों में 17.5 प्रतिशत रहा। 2004-05 की तुलना में 2009-10 में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आकस्मिकता वाला रोजगार तेजी से बढ़ा है। गौरतलब है कि यह प्रतिशत 2004-05 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमश: 35.0 और 15.1 प्रतिशत ही था। नई आर्थिक नीति और भूमंडलीकरण के पैरोकार तो यह मानने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते कि इस आर्थिक नीति में कुछ गलत भी हो सकता है। वे तो लगातार बढ़ती आर्थिक संवृद्धि का दंभ भरते हैं। गौरतलब है कि रोजगार में घटियापन उन्हीं वर्षो में सबसे ज्यादा बढ़ा, जब आर्थिक संवृद्धि सबसे ज्यादा तेज थी। 2004-05 और 2009-10 में आर्थिक संवृद्धि की दर औसत रूप में 8 से 9 प्रतिशत रही, जबकि पूर्व के वर्षो में वह उससे कहीं कम थी। लेकिन पूर्व के वर्षो में आकस्मिक रोजगार घटा था। आमतौर पर माना जाता है कि आर्थिक संवृद्धि के साथ रोजगार भी बढ़ता है, लेकिन वर्तमान आर्थिक संवृद्धि अभी तक रोजगारविहीन आर्थिक संवृद्धि ही मानी जाती है, क्योंकि इसमें जीडीपी तो बढ़ी, लेकिन रोजगार नहीं। पिछले पांच वर्षो में रोजगार में पहले से थोड़ी ज्यादा वृद्धि देखने को मिली, लेकिन वह रोजगार स्तरीय रोजगार नहीं था। वास्तव में इस कालखंड में कम मजदूरी वाला आकस्मिक रोजगार ही बढ़ा। यदि हम इस आर्थिक संवृद्धि की तस्वीर देखते हैं तो इस बात का उत्तर साथ ही साथ मिल जाता है। इस आर्थिक संवृद्धि में हमारी आधी से अधिक आबादी, जो कृषि पर निर्भर करती है, की कोई भागीदारी नहीं थी। जबकि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में 8 से 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, कृषि की स्थिति सोचनीय ही बनी रही और उसमें मात्र शून्य से तीन प्रतिशत (औसतन 2 प्रतिशत) संवृद्धि दर्ज की गई। साथ ही साथ अर्थव्यवस्था के शेष क्षेत्रों में भी आर्थिक संवृद्धि संगठित क्षेत्रों और कॉरपोरेट क्षेत्र तक ही सीमित रही। पूंजीपतियों का लाभ और कुछ खास लोगों के वेतन बढ़े, लेकिन बहुसंख्यक लोगों के रोजगार का स्तर या तो बढ़ नहीं पाया या घट गया। आकस्मिकता का मतलब आकस्मिक रोजगार यानी जहां श्रमिकों को काम में स्थायित्व और अन्य सुविधाओं का अभाव हो। ठेकेदारी व्यवस्था में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक जो गार्ड, सफाई कर्मचारी, ड्राइवर आदि के रूप काम करते हैं, वे सभी इसी श्रेणी में आते हैं। आकस्मिक रोजगार घटिया इसलिए माना जाता है, क्योंकि स्थायी कर्मचारियों की अपेक्षा आकस्मिक श्रमिकों की मजदूरी कम होती है और इसमें वृद्धि भी कम होती है। हम देखते हैं कि हमारे आसपास ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत काम करने वाले गार्ड, सफाई कर्मचारी आदि अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं और उनका वेतन भी गुजारे लायक वेतन से कहीं कम होता है। इन्हें मजदूरी के अतिरिक्त भत्ते आदि भी नहीं मिलते। दूसरी ओर वेतनभोगी स्थायी मजदूरों को बोनस, मकान किराया भत्ता, दवा और इलाज के लिए खर्च, मुफ्त टेलीफोन, यातायात भत्ता/कार आदि तमाम प्रकार की सुविधाएं मिलती हैं या इन सुविधायों के बाजार मूल्य के आधार पर भरपाई होती है। आकस्मिक श्रमिकों की निम्न मजदूरी जिस मजदूरी पर आकस्मिक श्रमिकों का गुजारा चलता है, वह भी बहुत ही निम्न स्तर की होती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, तीन प्रकार के अस्थायी मजदूरों के लिए अलग-अलग मजदूरी की गणना की गई है। शहरी क्षेत्रों में स्थायी कर्मचारियों की मजदूरी औसत 365 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में यह 232 रुपये आंकी गई है, जबकि निजी क्षेत्र के कार्यो के लिए भाड़े पर लिए गए आकस्मिक मजदूरों की मजदूरी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में क्रमश: 122 रुपये और 93 रुपये ही है। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में यह मजदूरी पुरुषों के लिए 98 रुपये और महिलाओं के लिए 86 रुपये थी। रोजगार गारंटी योजना और सरकारी प्रकल्पों पर भाड़े पर लिए गए मजदूरों की मजदूरी क्रमश: पुरुषों और महिलाओं के लिए मात्र 91 रुपये और 87 रुपये आंकी गई है। इसके अलावा यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि दिहाड़ी मजदूरों को वर्ष भर काम नहीं मिलता। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भी काम तो केवल 100 ही दिन मिल पाता है। शेष मजदूरों को तो उतना भी काम नसीब नहीं होता। वेतनभोगी मजदूरों से काम के दिनों में एक चौथाई से एक तिहाई ही मजदूरी और वास्तव में वर्ष भर में मात्र 100 दिनों से भी कम रोजगार की स्थिति देश में इन मजदूरों की बदतर स्थिति बयान करती है। नई आर्थिक नीति है दोषी इसके साथ मजदूरों में बढ़ती आकस्मिकता और अस्थायित्व अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वास्तव में नई आर्थिक नीति के चलते कृषि, लघु और कुटीर उद्योगों में स्वरोजगार घट रहा है। इसके साथ सरकारों द्वारा किसानों की भूमि का जबरन अधिग्रहण, किसान से उसका परंपरागत रोजगार छिन रहा है। ऐसे में स्वरोजगार युक्त श्रमिकों में मात्र पांच वर्षो में 251 लाख की कमी और उन स्वरोजगार युक्त लोगों का आकस्मिक श्रमिक के रूप में बदलाव देश में आम मजदूर और किसान की बदहाली की ओर इशारा कर रहा है। नई आर्थिक नीति के पैरोकारों को विचार करना होगा कि केवल जीडीपी आधरित आर्थिक संवृद्धि से आम आदमी के जीवन में सुधार नहीं हो सकता। लेकिन जब इस जीडीपी को बढ़ाने की कवायद में आम आदमी गरीबी की ओर जा रहा हो तो उस नीति का परित्याग कर जनोन्मुखी आर्थिक नीति बनानी होगी। कृषि, लघु उद्योग और अन्य स्वरोजगार प्रदान करने वाले क्षेत्रों का विकास और बचाव ही एकमात्र उपाय है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं).
Friday, July 1, 2011
देश में बढ़ती नशे की लत
बीते दिनों दिल्ली में नशीले पदार्थो की बरामदगी के दो बड़े मामले सामने आए। उनमें एक में महिपालपुर स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर छापा मारकर इंटेलिजेंस विभाग के अधिकारियों ने एक पार्सल बरामद किया, जिसमें से 14 किलों से अधिक हशीश थी। इसे कोलकाता से हांगकांग भेजा जा रहा था। दूसरे मामलें में मायापुरी स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर इंटेलिजेंस विभाग के छापे में करोड़ों की हेरोइन बरामद की गई। पुलिस के मुताबिक इस काले धंधे में एक नाइजीरियाई नागरिक भी शामिल था। वह पार्सल के बीच में हेरोइन छिपाकर अमेरिका भेजने की फिराक में था। इस तरह नशीले पदार्थो की बरामदगी अब रोजमर्रा की बात हो गई है। पिछले दिनों दिल्ली में सीमा शुल्क एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क के मुख्य आयुक्तों और महानिदेशकों के सम्मेलन में एक नए तथ्य का खुलासा हुआ कि देश में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त आतंकियों का पेट पालने के लिए सीमा पार बैठे उनके आका देश में चोरी छिपे ड्रग्स भेज रहे हैं। देश में आतंकियों को फंडिग के लिए ड्रग्स के कारोबार को मुख्य जरिया बना दिया गया है। ड्रग्स तस्करी के इस नए पैटर्न ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं। कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान से अवैध मादक पदार्थो की खेप की मात्रा हर साल तेजी से बढ़ रही है और उस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है। हर साल पाकिस्तान से अफगान निर्मित हशीश हजारों किलो की मात्रा में देश में लाई जाती है। ऐसा भी नहीं कि वह पकड़ी न जाती हो। बीते साल ही डीआरआइ ने 1267 किलोग्राम प्रतिबंधित केटामाइन हाइड्रोक्लोराइड जब्त किया था जो तीन साल पहले के मुकाबले दो गुना ज्यादा है। केटामाइन के अलावा एसेटिक एनहाइड्राइड की तस्करी में भी पिछले सालों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। नारकोटिक्स के अधिकारियों का कहना है कि सबसे ज्यादा तस्करी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हेरोइन की होती है, जिसका मुख्य केंद्र भारत-पाक सीमा है। तस्करी के इस कारोबार में सबसे ज्यादा दिल्ली में रहने वाले अफ्रीकी और अफगानी शामिल हैं। जिस तरह दिल्ली में आए-दिन मारी मात्रा में ड्रग्स की बरामदगी होती है उसे देखकर लगता है कि ड्रग तस्कर इसे ट्रांजिट प्वाइंट के बतौर इस्तेमाल कर रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर न केवल वह अवैध तरीके से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ दिल्ली लाने में कामयाब हो रहे हैं, बल्कि वह ड्रग्स को यहां से नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वी एशियाई देशों व दुनिया के अन्य मुल्कों को छोटे-छोटे पैकेट बनाकर भेज रहे हैं। इसमें आतंकी संगठनों का भी उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा है। देश में कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी हिस्से से करोड़ों की हशीश या हेरोइन के पकड़े जाने का समाचार न मिलता हो। यह सबूत है कि देश में नशे का कारोबार किस सीमा तक फैला हुआ है। असलियत में आज कोई एक देश नहीं, समूची दुनिया नशे की गिरफ्त में है। जहां तक दक्षिण एशियाई देशों का सवाल है भारत, पाक, अफगानिस्तान व म्यांमार अवैध मादक पदार्थो के बीस शीर्ष उत्पादकों में शामिल हैं और भारत में पश्चिम बंगाल और उत्तरांचल के कुछ भागों में अफीम की अवैध खेती निर्बाध गति से जारी है। गौरतलब है कि बोलिविया, वेनेजुएला और म्यांमार नशीले पदार्थो की तस्करी के लिए कुख्यात हैं। हमारे देश में मादक पदार्थो की तस्करी मुख्यत: पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल से होती है। विश्व में अफगानिस्तान अफीम पैदा करने वाला सबसे बड़ा देश है। एक अनुमान के अनुसार आज वहां चार-साढे़ चार हजार मीट्रिक टन अफीम हर वर्ष पैदा होती है। मेथाकुआलोन जैसी नशीली दवा के उत्पादन में भारत शीर्ष पर है। आइसीबी के अनुसार भारत से सबसे ज्यादा तादाद में दक्षिण अफ्रीका को अफीम का निर्यात होता है। जहां तक गांजा पीने वालों का सवाल है देश में इनकी तादाद तकरीब 90 लाख है, जबकि इसको 90 हजार के करीब किसान पैदा करने में लगे हैं। दवाओं के निर्माण को लें तो इसमें तकरीब 100 मीट्रिक टन पदार्थो का उपयोग होता है, जबकि शेष अमेरिका और अन्य देशों को निर्यात किया जाता है। सीबीएन की मानें तो कानूनन अफीम की खेती के लिए यूपी, एमपी व राजस्थान जाने जाते हैं, जबकि गैर-कानूनी तौर पर इन राज्यों सहित अरुणाचल, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी अफीम की खेती होती है। असलियत में पिछले कुछ वर्षो से अफीम, चरस, हेरोइन, स्मैक, हशीश व अन्य मादक पदार्थो के अलावा भारत कोकीन आपूर्ति का नया केंद्र बनता जा रहा है। गौरतलब है कि यह दुनिया का सबसे महंगा मादक पदार्थ है जो ब्राजील, मैक्सिको, कोलंबिया, पनामा और वेनेजुएला जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में बहुतायत में पाए जाने वाले कोकोवा प्लांट की पत्तियों से बनती है। इन देशों में इसकी कीमत पांच सौ से सात सौ रुपये प्रति ग्राम होती है और जैसे ही यह अफ्रीकी देशों में पहंुचती है इसकी कीमत दोगुनी हो जाती है। भारत पहुंचने पर इसकी कीमत छह से आठ गुना तक बढ़ जाती है और पांच-साढ़े पांच हजार रुपये प्रति ग्राम तक हो जाती है। इस कारोबार में लगे लोग इसे अफ्रीकी देशों के जरिये समुद्री रास्ते से पानी के जहाजों में छुपाकर भारत व अन्य एशियाई देशों में पहुंचाते हैं और फिर यहां से अपने नेटवर्क और कैरियर के जरिये यूरोपीय देशों में पहुंचाते हैं। नारकोटिक्स विभाग के अनुसार अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर साल बीस से पच्चीस किलो से ज्यादा कोकीन का कारोबार होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कार से लेकर बार रेस्टोरेंट तक यह उपलब्ध है। इसे बड़े अमीर लोगों के मजे का शगल बताया जाता है। फिर भी इतनी बड़ी तादाद में इसकी आपूर्ति चिंता की बात है। नशों के आदी लोगों की संख्या एक फीसदी भी नहीं हैं। देश में इसकी सबसे ज्यादा खपत मुंबई, दिल्ली और गोवा में है और इस धंधे में दो दर्जन से ज्यादा गिरोह लगे हैं। ये कोकीन, हेरोइन, स्मैक, चरस व अफीम का कारोबार राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों से चलाते हैं। इसके अलावा वे हाईडोज टैबलेट के प्रसार में नाइजीरियन, अफगानी व कश्मीरियों का इस्तेमाल करते हैं। नारकोटिक्स विभाग की मानें तो वे अपना नेटवर्क फैलाने में पुरुषों के साथ महिलाओं का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं और माल की आपूर्ति के लिए वे अपनी सुरक्षा व सहूलियत का ध्यान रखते हुए स्थान भी खुद ही तय करते हैं। इस तरह वह अपने नेटवर्क के जरिये समूचे देश में मादक पदार्थो की आपूर्ति करते हैं और इस काम में उन्हें नेता, नौकरशाह और पुलिस अधिकारियों तक का हरसंभव सहयोग मिलता है। इसके बलबूते ही वह मादक पदार्थो के कारोबार को बखूबी अंजाम देते हैं। पुलिस, सुरक्षा बलों और नारकोटिक्स विभाग की तमाम चौकसी के बावजूद दिनोंदिन यह धंधा सुरसा की मंुह की तरह बढ़ता जा रहा है। यदि इस कारोबार पर नकेल नहीं कसी जाती है तो अपराध पर नकेल लगाना मुश्किल होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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