दिल्ली में एक पुजारी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा के साथ लगभग तीन महीने तक बलात्कार करता रहा। निश्चित तौर पर यह शर्मनाक कृत्य है। हालांकि ऐसी वारदातें नई भी नहीं हैं, लेकिन राजधानी दिल्ली में इस तरह की घटनाएं जाहिर तौर पर जनमानस के लिए चिंता की बात हैं। हवस के दरिंदे हमारे समाज में किन-किन रूपों में मौजूद हैं, इस तरह की शर्मनाक घटना से पता चल जाता है। धर्म के प्रति आग्रह भारत में कोई नई बात नहीं है। यहां तंत्र-मंत्र, जादू-टोने के प्रति लोगों की जिज्ञासा भी कोई अचरज की बात नहीं, लेकिन जब पढ़े-लिखे लोग तक इन टोटकों के चक्कर में पड़ कर अपना सब कुछ लुटा दें तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। डीयू की छात्रा की अस्मत दुष्कर्मी पुजारी पिछले तीन महीने से तार-तार करता रहा, लेकिन इस बारे में उसके मां-बाप को तब जानकारी हुई, जब उनकी बिटिया के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा। यह कृत्य उस विश्वविद्यालय की छात्रा के साथ हुआ, जो देश के आला विश्वविद्यालयों में शुमार किया जाता है। ऐसी घटनाओं का शिकार ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार होते हैं, जो देश के छोटे शहर या कस्बे से दिल्ली और अन्य महानगरों में आकर बसते हैं। लेकिन जो अपने जेहन से गांवों में गुजिस्ता दिनों की यादों को मिटा नहीं पाते। अंधविश्वास और परंपरावादी नियमों की जंजीरों से वे आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। ऐसे लोग खुद को भले ही आधुनिक ख्यालों का मानते हों, लेकिन भूत-भविष्य बताने वाले बाबाओं और फकीरों को देखकर उनकी आंखें आज भी चमक उठती हैं। उन्हें लगता है कि इनकी शरण में आकर उनकी निजी और पारिवारिक समस्याएं खत्म हो जाएंगी। वैसे, तो ढोंगी बाबाओं और साधुओं की संगत में पुरुष-महिला भेदभाव नजर नहीं आता, लेकिन भावनात्मक रूप से कमजोर महिलाओं को धोखा देना ज्यादा आसान हो जाता है। फिर चाहे वे कितनी ही साक्षर क्यों न हों। अंधविश्वासी होने की एक और बड़ी वजह है हमारे सामाजिक ढांचे का धर्म पर आधारित होना। उस पर से अशिक्षा इसे और फलने-फूलने का मौका देती है। समाज में विभिन्न प्रकार के भय और असुरक्षा की भावनाएं हैं। यही कारण है कि अंधविश्वास का वजूद कायम है। मिसाल के तौर पर बुरी नजर से बचाने के लिए नींबू और चंद हरी मिर्च का इस्तेमाल ट्रकों, दुकानों से लेकर कई जगहों पर दिखाई दे जाता है। एक बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद देश के अनेक भागों में लोग अंधविश्वास और रूढि़वादी सोच में कैद हैं। ये न केवल भूत-प्रेतों के अस्तित्व पर भरोसा करते हैं, बल्कि मनोरोगों को भूत-प्रेत, बाहरी हवा, शैतानी ताकतों, बुरी आत्मा की छाया मानते हैं। उससे निजात पाने के लिए रोगियों को तांत्रिकों के पास ले जाते हैं। सवाल है कि क्या वास्तव में भूत-प्रेत का अस्तित्व है? हमारे देश में कई स्थानों पर भूत-प्रेत, बलाओं को भगाने के दरबार हैं, जो मनुष्यों के ऊपर चढ़े कथित भूत-प्रेत के साये को भगाने के लिए खुलेआम चल रहे हैं। कहीं न कहीं यह हमारी व्यवस्था और सामाजिक ढांचे से जुड़ा हुआ है। एक मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे बड़ी दिक्कत है उसकी लाचारी। उसे यह महसूस होता है कि उसके आगे पीछे कोई न कोई सहारा हो। इस तरह की सोच उसके जेहन में इस कदर पैबस्त हो गई है कि लाख कोशिशों के बाद भी वह इसकी जकड़न से मुक्त नहीं हो रहा। सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों को निभाते वक्त कई बार इंसान इस कदर लाचार हो जाता है कि कर्म से ज्यादा किस्मत पर भरोसा करने लगता है। ऐसे ही लोगों के अंदर धीरे-धीरे यह भावना घर कर जाती है कि इस संसार में वह बिल्कुल अकेला है। वह सोचता है कि शायद उसके भाग्य में यही लिखा है। इस भावना के साथ ही शुरुआत होती है तकदीर की आस में जीने की मुसलसल आदत। कोई भी आदत एक दिन में नहीं बनती। पहले उसका ख्याल आता है, फिर उसका एहसास होता है। उसके बाद उसे अमल में लाया जाता है और फिर एक दिन यह हमारी आदत बन जाती है। किसी पश्चिमी चिंतक का कहना था, धर्म की शुरुआत वहीं से होती है, जब हमारे सोचने-विचारने की क्षमता लुप्त होने लगती है। लाखों-करोड़ों लोग धर्म की मूल व्याख्या के विपरीत आचरण करने वाले बाबाओं के फेर में उनके मठों, दरगाहों का चक्कर काटने लगते हैं। यही वजह है कि आज गली-कूचों में निर्मोही बाबा, बंगाली बाबा, कंकाली बाबा, हकीम बाबा और न जाने कैसे-कैसे बाबाओं की दुकानें खुल गई हैं, जो दिव्य शक्ति और रूहानी ताकतों के सहारे लोगों की मुश्किलें हल करने का दावा करते हैं। उनके मठों तक पहुंचने वाले अशिक्षित ही नहीं होते, उनमें दिल्ली विश्वविद्यालय की पढ़ी-लिखी लड़कियां भी होती हैं। आस्था के चश्मे से वे हवस के पुजारियों को पहचान नहीं पातीं। गलत हरकतें भी बाबा की महिमा लगती है, लेकिन जब उनकी नींद खुलती है तो आंखों के सामने कभी न खत्म होने वाला अंधेरा होता है। बाबाओं के शोषण की शिकार सैकड़ों लड़कियां और औरतें चुपचाप इस घिनौने कृत्य को बर्दाश्त कर लेती हैं। कुछ ही मामले प्रकाश में आ पाते हैं। आस्था के नाम पर पुलिस और प्रशासन भी ऐसे बाबाओं के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने से बचता है। बाबाओं के यहां बड़े-बड़े मंत्री और अधिकारियों का मत्था टेकना इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है। डीयू की छात्रा के साथ हुआ हादसा पहला वाकया नहीं है। ऐसे कई मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। धर्म और राजनीति का कॉकटेल तो आदि काल से चला आ रहा है, लेकिन सेक्स के तड़के ने आध्यात्म को दूषित कर दिया है। ऐसे में भरोसा करें तो किस पर? स्वामी नित्यानंद अपने सेक्स स्कैंडल के लिए सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। कहा जाता है कि स्वामी प्राचीन तांत्रिक रहस्यों की शिक्षा देने और उनके प्रयोग के लिए अपने आश्रम में आने वाली महिलाओं से सीक्रेट सेक्स एग्रीमेंट करता था। इसके अनुसार, महिलाओं को नग्नता और सेक्स के लिए सहमति जतानी होती थी। अपनी अश्लील फोटो खींचने की अनुमति देनी पड़ती थी। साथ ही उन्हें इस बात की सख्त हिदायत दी जाती थी कि इस बात को वे आश्रम से बाहर नहीं ले जाएं। इसी तरह भीमानंद उर्फ इच्छाधारी बाबा साधु का चोला पहनकर जिस्मफरोशी का धंधा करवाता था। सवाल यह है कि कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मठों और उनके संचालकों के ऊपर पैनी नजर क्यों नहीं रखी जा रही है। सुप्रीमकोर्ट जिस तरह ऑनर किलिंग को लेकर सख्त है, देश के कई सामाजिक कार्यकर्ता और संगठन इसके खिलाफ एक मुहिम भी चला रहे हैं। ठीक उसी तरह इन अंधविश्वासों के खिलाफ कोई आवाज बुलंद करने वाला क्यों नहीं है। कब तक इन बाबाओं और फकीरों के चक्कर में लड़कियों, औरतों की जिंदगी नर्क बनती रहेगी। क्यों किसी हादसे के बाद हमारे समाज की नींद भी खुलती है और प्रशासन भी हरकत में आता है? मीडिया को ऐसी घटनाएं कच्चे गोश्त की मानिंद मसाला देकर लोगों के सामने परोसने में तो मजा आता है। आखिर टीआरपी जो बढ़ती है, लेकिन क्या मीडिया ऐसे पाखंडियों के खिलाफ कोई अभियान नहीं छेड़ सकती। क्यों कुछ ही अरसे बाद उसी समाज में फिर से उठ खड़ा होता है एक नया ढोंगी बाबा.
Wednesday, June 1, 2011
चमत्कार की आड़ में जुर्म का खेल
दिल्ली में एक पुजारी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा के साथ लगभग तीन महीने तक बलात्कार करता रहा। निश्चित तौर पर यह शर्मनाक कृत्य है। हालांकि ऐसी वारदातें नई भी नहीं हैं, लेकिन राजधानी दिल्ली में इस तरह की घटनाएं जाहिर तौर पर जनमानस के लिए चिंता की बात हैं। हवस के दरिंदे हमारे समाज में किन-किन रूपों में मौजूद हैं, इस तरह की शर्मनाक घटना से पता चल जाता है। धर्म के प्रति आग्रह भारत में कोई नई बात नहीं है। यहां तंत्र-मंत्र, जादू-टोने के प्रति लोगों की जिज्ञासा भी कोई अचरज की बात नहीं, लेकिन जब पढ़े-लिखे लोग तक इन टोटकों के चक्कर में पड़ कर अपना सब कुछ लुटा दें तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। डीयू की छात्रा की अस्मत दुष्कर्मी पुजारी पिछले तीन महीने से तार-तार करता रहा, लेकिन इस बारे में उसके मां-बाप को तब जानकारी हुई, जब उनकी बिटिया के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा। यह कृत्य उस विश्वविद्यालय की छात्रा के साथ हुआ, जो देश के आला विश्वविद्यालयों में शुमार किया जाता है। ऐसी घटनाओं का शिकार ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार होते हैं, जो देश के छोटे शहर या कस्बे से दिल्ली और अन्य महानगरों में आकर बसते हैं। लेकिन जो अपने जेहन से गांवों में गुजिस्ता दिनों की यादों को मिटा नहीं पाते। अंधविश्वास और परंपरावादी नियमों की जंजीरों से वे आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। ऐसे लोग खुद को भले ही आधुनिक ख्यालों का मानते हों, लेकिन भूत-भविष्य बताने वाले बाबाओं और फकीरों को देखकर उनकी आंखें आज भी चमक उठती हैं। उन्हें लगता है कि इनकी शरण में आकर उनकी निजी और पारिवारिक समस्याएं खत्म हो जाएंगी। वैसे, तो ढोंगी बाबाओं और साधुओं की संगत में पुरुष-महिला भेदभाव नजर नहीं आता, लेकिन भावनात्मक रूप से कमजोर महिलाओं को धोखा देना ज्यादा आसान हो जाता है। फिर चाहे वे कितनी ही साक्षर क्यों न हों। अंधविश्वासी होने की एक और बड़ी वजह है हमारे सामाजिक ढांचे का धर्म पर आधारित होना। उस पर से अशिक्षा इसे और फलने-फूलने का मौका देती है। समाज में विभिन्न प्रकार के भय और असुरक्षा की भावनाएं हैं। यही कारण है कि अंधविश्वास का वजूद कायम है। मिसाल के तौर पर बुरी नजर से बचाने के लिए नींबू और चंद हरी मिर्च का इस्तेमाल ट्रकों, दुकानों से लेकर कई जगहों पर दिखाई दे जाता है। एक बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद देश के अनेक भागों में लोग अंधविश्वास और रूढि़वादी सोच में कैद हैं। ये न केवल भूत-प्रेतों के अस्तित्व पर भरोसा करते हैं, बल्कि मनोरोगों को भूत-प्रेत, बाहरी हवा, शैतानी ताकतों, बुरी आत्मा की छाया मानते हैं। उससे निजात पाने के लिए रोगियों को तांत्रिकों के पास ले जाते हैं। सवाल है कि क्या वास्तव में भूत-प्रेत का अस्तित्व है? हमारे देश में कई स्थानों पर भूत-प्रेत, बलाओं को भगाने के दरबार हैं, जो मनुष्यों के ऊपर चढ़े कथित भूत-प्रेत के साये को भगाने के लिए खुलेआम चल रहे हैं। कहीं न कहीं यह हमारी व्यवस्था और सामाजिक ढांचे से जुड़ा हुआ है। एक मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे बड़ी दिक्कत है उसकी लाचारी। उसे यह महसूस होता है कि उसके आगे पीछे कोई न कोई सहारा हो। इस तरह की सोच उसके जेहन में इस कदर पैबस्त हो गई है कि लाख कोशिशों के बाद भी वह इसकी जकड़न से मुक्त नहीं हो रहा। सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों को निभाते वक्त कई बार इंसान इस कदर लाचार हो जाता है कि कर्म से ज्यादा किस्मत पर भरोसा करने लगता है। ऐसे ही लोगों के अंदर धीरे-धीरे यह भावना घर कर जाती है कि इस संसार में वह बिल्कुल अकेला है। वह सोचता है कि शायद उसके भाग्य में यही लिखा है। इस भावना के साथ ही शुरुआत होती है तकदीर की आस में जीने की मुसलसल आदत। कोई भी आदत एक दिन में नहीं बनती। पहले उसका ख्याल आता है, फिर उसका एहसास होता है। उसके बाद उसे अमल में लाया जाता है और फिर एक दिन यह हमारी आदत बन जाती है। किसी पश्चिमी चिंतक का कहना था, धर्म की शुरुआत वहीं से होती है, जब हमारे सोचने-विचारने की क्षमता लुप्त होने लगती है। लाखों-करोड़ों लोग धर्म की मूल व्याख्या के विपरीत आचरण करने वाले बाबाओं के फेर में उनके मठों, दरगाहों का चक्कर काटने लगते हैं। यही वजह है कि आज गली-कूचों में निर्मोही बाबा, बंगाली बाबा, कंकाली बाबा, हकीम बाबा और न जाने कैसे-कैसे बाबाओं की दुकानें खुल गई हैं, जो दिव्य शक्ति और रूहानी ताकतों के सहारे लोगों की मुश्किलें हल करने का दावा करते हैं। उनके मठों तक पहुंचने वाले अशिक्षित ही नहीं होते, उनमें दिल्ली विश्वविद्यालय की पढ़ी-लिखी लड़कियां भी होती हैं। आस्था के चश्मे से वे हवस के पुजारियों को पहचान नहीं पातीं। गलत हरकतें भी बाबा की महिमा लगती है, लेकिन जब उनकी नींद खुलती है तो आंखों के सामने कभी न खत्म होने वाला अंधेरा होता है। बाबाओं के शोषण की शिकार सैकड़ों लड़कियां और औरतें चुपचाप इस घिनौने कृत्य को बर्दाश्त कर लेती हैं। कुछ ही मामले प्रकाश में आ पाते हैं। आस्था के नाम पर पुलिस और प्रशासन भी ऐसे बाबाओं के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने से बचता है। बाबाओं के यहां बड़े-बड़े मंत्री और अधिकारियों का मत्था टेकना इसकी एक बड़ी वजह हो सकती है। डीयू की छात्रा के साथ हुआ हादसा पहला वाकया नहीं है। ऐसे कई मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। धर्म और राजनीति का कॉकटेल तो आदि काल से चला आ रहा है, लेकिन सेक्स के तड़के ने आध्यात्म को दूषित कर दिया है। ऐसे में भरोसा करें तो किस पर? स्वामी नित्यानंद अपने सेक्स स्कैंडल के लिए सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। कहा जाता है कि स्वामी प्राचीन तांत्रिक रहस्यों की शिक्षा देने और उनके प्रयोग के लिए अपने आश्रम में आने वाली महिलाओं से सीक्रेट सेक्स एग्रीमेंट करता था। इसके अनुसार, महिलाओं को नग्नता और सेक्स के लिए सहमति जतानी होती थी। अपनी अश्लील फोटो खींचने की अनुमति देनी पड़ती थी। साथ ही उन्हें इस बात की सख्त हिदायत दी जाती थी कि इस बात को वे आश्रम से बाहर नहीं ले जाएं। इसी तरह भीमानंद उर्फ इच्छाधारी बाबा साधु का चोला पहनकर जिस्मफरोशी का धंधा करवाता था। सवाल यह है कि कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मठों और उनके संचालकों के ऊपर पैनी नजर क्यों नहीं रखी जा रही है। सुप्रीमकोर्ट जिस तरह ऑनर किलिंग को लेकर सख्त है, देश के कई सामाजिक कार्यकर्ता और संगठन इसके खिलाफ एक मुहिम भी चला रहे हैं। ठीक उसी तरह इन अंधविश्वासों के खिलाफ कोई आवाज बुलंद करने वाला क्यों नहीं है। कब तक इन बाबाओं और फकीरों के चक्कर में लड़कियों, औरतों की जिंदगी नर्क बनती रहेगी। क्यों किसी हादसे के बाद हमारे समाज की नींद भी खुलती है और प्रशासन भी हरकत में आता है? मीडिया को ऐसी घटनाएं कच्चे गोश्त की मानिंद मसाला देकर लोगों के सामने परोसने में तो मजा आता है। आखिर टीआरपी जो बढ़ती है, लेकिन क्या मीडिया ऐसे पाखंडियों के खिलाफ कोई अभियान नहीं छेड़ सकती। क्यों कुछ ही अरसे बाद उसी समाज में फिर से उठ खड़ा होता है एक नया ढोंगी बाबा.
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