देश में मैला ढोने की कुप्रथा से चिंतित प्रधानमंत्री ने छः माह के भीतर देश को इस कलंक से मुक्ति दिलाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि यह काम बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि इस बारे में बेहद सख्त कानून मौजूद है, जरूरत है केवल उस पर प्रभावी अमल की।
प्रधानमंत्री की चिंता स्वाभाविक है क्योंकि जहाँ एक ओर देश की आर्थिक उन्नाति से संपूर्ण विश्व की आँखें चौंधिया रही हैं वहीं दूसरी ओर एक बड़ा तबका सिर पर मैला ढो रहा है। देश में वर्तमान समय में कितने लोग यह अभिशप्त जीवन जी रहे हैं, इन आँकड़ों पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है, क्योंकि कोई भी राज्य सहर्ष स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसके राज्य में मैला ढोने की प्रथा कायम है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सहित कई अन्य संगठन इनकी संख्या १२ से १५ लाख के मध्य बताते हैं। देश की स्वतंत्रता के छः दशक बीत जाने के बाद भी सफाई कर्मचारी सिर पर मैला ढोने के लिए क्यों विवश हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यूँ तो ११वीं योजना में २०१२ तक मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने की बात कही गई है। ग्यारहवीं योजना में सफाई कर्मचारियों पर गठित एक उपसमूह की रिपोर्ट के आधार पर देश से मैला ढोने जैसी दुखद प्रथा पूर्णतया समाप्त करने और इसमें लगे लोगों का पुनर्वास करने का ब्ल्यू प्रिंट तैयार किया गया है। वैसे तो शुष्क शौचालय बनाने पर रोक लगाने और मैला ढोने वालों को रोजगार देने वाले कानून को १९९३ में संसद द्वारा पारित कर दिया गया था, परंतु इससे इन पीड़ितों का जीवन नहीं बदला जो अपशिष्ट को सिर पर ढो रहे हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन गत इक्कीस वर्षों से चल रहा है। यह अभियान भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ है जहाँ एक मानव दूसरे मानव का अपशिष्ट उठाने के लिए बाध्य है। अक्टूबर ०७ में उच्चतम न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए अधिसूचना जारी करने के निर्देश दिए थे। सफाई कर्मचारी की समस्याओं के प्रति असंवेदनशीलता इस तथ्य से साफ जाहिर होती है कि १०वीं पंचवर्षीय योजना में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने एवं इसमें लगे लोगों को रोजगार देने व शुष्क शौचालयों को बदलने के लिए ४६० करोड़ रुपए आवंटित किए गए, लेकिन खर्च मात्र १४६.०४ करोड़ रुपए ही हुए। मोहम्मद सलीम की अध्यक्षता वाली शहरी विकास संबंधी संसद की स्थायी समिति ने लोकसभा में पेश २५वें प्रतिवेदन में स्पष्ट किया था कि मैला ढोने की अमानवीय प्रथा समाप्त करने के उद्देश्य से प्रारंभ से लाभ के स्थान पर हानि अधिक हुई है। तमाम सरकारी घोषणाओं के बावजूद यह कहना मुश्किल है कि मैला ढोने की प्रथा देश से समाप्त हो ही जाएगी क्योंकि सवाल प्रतिबद्धता का है।
प्रधानमंत्री की चिंता स्वाभाविक है क्योंकि जहाँ एक ओर देश की आर्थिक उन्नाति से संपूर्ण विश्व की आँखें चौंधिया रही हैं वहीं दूसरी ओर एक बड़ा तबका सिर पर मैला ढो रहा है। देश में वर्तमान समय में कितने लोग यह अभिशप्त जीवन जी रहे हैं, इन आँकड़ों पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है, क्योंकि कोई भी राज्य सहर्ष स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसके राज्य में मैला ढोने की प्रथा कायम है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सहित कई अन्य संगठन इनकी संख्या १२ से १५ लाख के मध्य बताते हैं। देश की स्वतंत्रता के छः दशक बीत जाने के बाद भी सफाई कर्मचारी सिर पर मैला ढोने के लिए क्यों विवश हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यूँ तो ११वीं योजना में २०१२ तक मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने की बात कही गई है। ग्यारहवीं योजना में सफाई कर्मचारियों पर गठित एक उपसमूह की रिपोर्ट के आधार पर देश से मैला ढोने जैसी दुखद प्रथा पूर्णतया समाप्त करने और इसमें लगे लोगों का पुनर्वास करने का ब्ल्यू प्रिंट तैयार किया गया है। वैसे तो शुष्क शौचालय बनाने पर रोक लगाने और मैला ढोने वालों को रोजगार देने वाले कानून को १९९३ में संसद द्वारा पारित कर दिया गया था, परंतु इससे इन पीड़ितों का जीवन नहीं बदला जो अपशिष्ट को सिर पर ढो रहे हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन गत इक्कीस वर्षों से चल रहा है। यह अभियान भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ है जहाँ एक मानव दूसरे मानव का अपशिष्ट उठाने के लिए बाध्य है। अक्टूबर ०७ में उच्चतम न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मैला ढोने की प्रथा खत्म करने के लिए अधिसूचना जारी करने के निर्देश दिए थे। सफाई कर्मचारी की समस्याओं के प्रति असंवेदनशीलता इस तथ्य से साफ जाहिर होती है कि १०वीं पंचवर्षीय योजना में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने एवं इसमें लगे लोगों को रोजगार देने व शुष्क शौचालयों को बदलने के लिए ४६० करोड़ रुपए आवंटित किए गए, लेकिन खर्च मात्र १४६.०४ करोड़ रुपए ही हुए। मोहम्मद सलीम की अध्यक्षता वाली शहरी विकास संबंधी संसद की स्थायी समिति ने लोकसभा में पेश २५वें प्रतिवेदन में स्पष्ट किया था कि मैला ढोने की अमानवीय प्रथा समाप्त करने के उद्देश्य से प्रारंभ से लाभ के स्थान पर हानि अधिक हुई है। तमाम सरकारी घोषणाओं के बावजूद यह कहना मुश्किल है कि मैला ढोने की प्रथा देश से समाप्त हो ही जाएगी क्योंकि सवाल प्रतिबद्धता का है।
